Sunday, June 14, 2015

साल भर पहले "अच्छे दिन" का सपना देखने वाले लोग आज मा. अटल बिहारी वाजपेयी की यह कविता गुनगुना रहें होंगे... =============== चौराहे पर लुटता चीर प्यादे से पिट गया वजीर चलूँ आखिरी चाल कि बाजी छोड़ विरक्ति सजाऊँ मैं? राह कौन सी जाऊँ मैं?

   
Dhananjay Aditya
June 14 at 10:41am
 
साल भर पहले "अच्छे दिन" का सपना देखने वाले लोग आज मा. अटल बिहारी वाजपेयी की यह कविता गुनगुना रहें होंगे... 
=============== 
चौराहे पर लुटता चीर 
प्यादे से पिट गया वजीर 
चलूँ आखिरी चाल कि 
बाजी छोड़ विरक्ति सजाऊँ मैं? 
राह कौन सी जाऊँ मैं? 
. 
सपना जन्मा और मर गया 
मधु ऋतु में ही बाग झर गया 
तिनके टूटे हुये बटोरूँ या 
नवसृष्टि सजाऊँ मैं? 
राह कौन सी जाऊँ मैं? 
. 
दो दिन मिले उधार में 
घाटों के व्यापार में 
क्षण-क्षण का हिसाब लूँ या 
निधि शेष लुटाऊँ मैं? 
राह कौन सी जाऊँ मैं ? 
By Dhananjay Aditya. 
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