Tuesday, September 19, 2017

रवींद्र का दलित विमर्श-29 हिंदू राष्ट्र सिर्फ संघ परिवार का कार्यक्रम नहीं है। मनुस्मृति विधान बहाली की सत्ता वर्ग और वर्ण की सारी ताकतें ईस्ट इंडिया कंपनी के राज के समय से सक्रिय हैं। चैतन्य महाप्रभू के वैष्णव आंदोलन से लेकर ब्रहम समाज आंदोलन,नवजागरण और सूफी संत आंदोलन के खिलाफ हिंदुत्व का पुनरूत्थान एक अटूट सिलसिला है।फर्क इतना है कि तब एकमात्र ईस्ट इंडिया कंपनी का राज था और अ�

रवींद्र का दलित विमर्श-29

हिंदू राष्ट्र सिर्फ संघ परिवार का कार्यक्रम नहीं है।

मनुस्मृति विधान बहाली की सत्ता वर्ग और वर्ण की सारी ताकतें ईस्ट इंडिया कंपनी के राज के समय से सक्रिय हैं।

चैतन्य महाप्रभू के वैष्णव आंदोलन से लेकर ब्रहम समाज आंदोलन,नवजागरण और सूफी संत आंदोलन के खिलाफ हिंदुत्व का पुनरूत्थान एक अटूट सिलसिला है।फर्क इतना है कि तब एकमात्र ईस्ट इंडिया कंपनी का राज था और अब डिजिटल इंडिया में हजारों ईस्ट इंडिया कंपनियों का राज है।

1980 के दशक से या फिर 1970 के दशक नक्सलसमय के दौरान दक्षिण पंथी ताकतों के ध्रूवीकरण से सिर्फ सत्ता समीकरण बदला है,कोई नई शुरुआत नहीं हुई है।

बौद्धमय भारत के अंत के बाद ब्राह्मण धर्म के मनुस्मृति विधान की बहाली के लिए हिंदुत्व का पुनरूत्थान एक अटूट सिलसिला है,इसे समझे बिना नस्ली वर्चस्व के नरसंहारी राष्ट्रवाद का प्रतिरोध असंभव है।

रवींद्र का दलित विमर्श औपनिवेशिक भारत में हिंदुत्व के उसी पुनरूत्थान के प्रतिरोध में है।

पलाश विश्वास

बौद्धमय भारत के अंत के बाद ब्राह्मण धर्म के मनुस्मृति विधान की बहाली के लिए हिंदुत्व का पुनरूत्थान एक अटूट सिलसिला है,इसे समझे बिना नस्ली वर्चस्व के नरसंहारी राष्ट्रवाद का प्रतिरोध असंभव है।रवींद्र का दलित विमर्श औपनिवेशिक भारत में हिंदुत्व के उसी पुनरूत्थान के प्रतिरोध में है।

14 मई के बाद हमारी दुनिया सिरे से बदल गयी है और इससे पहले भारत में नस्ली अंध राष्ट्रवाद जैसा कुछ नहीं था या सत्ता समीकरण के सोशल इंजीनियरिंग से मनुस्मृति शासन का अंत हो जायेगा और समता और न्याय का भारततीर्थ का पुनर्जन्म होगा,ऐसा मानकर जो लोग नस्ली विषमता,घृणा, हिंसा और नरसंहार संस्कृति की मौजूदा व्यवस्था बदलने का ख्वाब देखते हैं,उनके लिए निवेदन है कि किसी भी तरह का कैंसर अचानक मृत्यु का कारण नहीं होता और बीज से वटवृक्ष बनने की एक पूरी प्रक्रिया होती है।

1980 के दशक से या फिर 1970 के दशक नक्सलसमय के दौरान दक्षिण पंथी ताकतों के ध्रूवीकरण से सिर्फ सत्ता समीकरण बदला है,कोई नई शुरुआत नहीं हुई है।

बेहतर हो कि बंगालियों के साहित्य सम्राट ऋषि बंकिम चंद्र के उपन्यास आनंदमठ को एकबार फिर नये सिरे से पढ़ लें,कम से कम उसका अंतिम अध्याय पढ़ लें,जिसमें दैववाणी होती है कि म्लेच्छों के शासन के अंत के बाद जबतक हिंदू राष्ट्र की स्थापना नहीं हो जाती,तब तक भारत के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी का राज जारी रहना चाहिए।

बंकिम ने 1857 की क्रांति के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी का राज खत्म होने के बाद महारानी विक्टोरिया के घोषणापत्र के तहत भारत के सीधे तौर पर ब्रिटिश साम्राज्य के उपनिवेश बन जाने के बाद बंगाल के बाउल फकीर संन्यासी आदिवासी किसान विद्रोह को सन्यासी विद्रोह में समेटते हुए इस उपन्यास का प्रकाशन 1882 में किया था।

भारतीय नस्ली वर्चस्व के मनुस्मृति राष्ट्रवाद और हिंदू राष्ट्र के भौतिकी और रसायनशास्त्र को ठीक से समझने के लिए बंकिम के आनंदमठ का पाठ अनिवार्य है।

वंदेमातरम राष्ट्रवाद मार्फत भारतमाता की परिकल्पना में बंकिम ने 1882 में ही हिंदू राष्ट्र की स्थापना कर दी थी और इस वंदे मातरम राष्ट्रवाद का अंतिम लक्ष्य हिंदू राष्ट्र की स्थापना और मनुस्मृति विधान की बहाली है।

रवींद्र नाथ मनुष्यता के धर्म,सभ्यता के संकट जैसे निबंधों,रूस की चिट्ठियों, चंडालिका,रक्त करबी और ताशेर घर जैसी नृत्य नाटिकाओं,राजर्षि जैसे उपन्यास और बाउल फकीर प्रभावित अपने तमाम गीतों और गीतांजलि के माध्यम से हिंदुत्व के इसी पुनरूत्थान के प्रतिरोध की जमीन बहुजन,आदिवासी,किसान आंदोलन की साझा विरासत के तहत बनाने की निरंतर कोशिशें की है।

रवींद्र का भारत तीर्थ उतना ही आदिवासियों का है,जितना गैर आदिवासियों का।

रवींद्र का भारत तीर्थ उतना ही अनार्य द्रविड़ शक हुण कुषाण पठान मुगल सभ्यताओं का है जितना कि वैदिकी और आर्य सभ्यता का।

रवींद्र का भारत तीर्थ उतना ही मुसलमानों,बौद्धों,ईसाइयों,सिखों,जैनियों और दूसरे गैर हिंदुओं का है जितना कि बहुसंख्य हिंदुओं का।

नव जागरण क दौरानसती प्रथा के अंत और विधवा विवाह,स्त्री शिक्षा के लक्ष्य में सबसे ज्यादा सक्रिय ईश्वर चंद्र विद्यासागर पर बार बार कट्टर हिंदुत्ववादियों के हमले होते रहे।बंगाल का कट्टर कुलीन ब्राह्मण सवर्ण समाज उनके खिलाफ संगठित था लेकिन ईस्ट इंडिया कंपनी के राजकाज में वे विद्यासागर के वध में उसतरह कामयाब नहीं हुए जैसे कि स्वतंत्र भारत में हिंदू राष्ट्र के झंडेवरदारों ने गांधी की हत्या कर दी और अब जैसे दाभोलकर,पानसारे,कुलबर्गी,रोहित वेमुला और गौरी लंकेश की हत्याओं के साथ सात गोरक्षा तांडव में देश भर में आम बेगुनाह नागरिकों की हत्याएं हो रही हैं।वध का इस विशुद्ध कार्यक्रमयह सिलसिला चैतन्य महाप्रभू और संत तुकाराम, गुरु गोविंद सिंह की हत्याओं के बाद कभी थमा ही नहीं है।संत कबीर पर भी हमले होते रहे और उस हमले में हिंदुत्व और इस्लाम के कटट्रपंथी साथ साथ थे। जैसे रवींद्र के खिलाप,लालन फकीर के खिलाफ हिंदुत्व और इस्लाम के  कट्टरपंथी मोर्चांबद हैं।

इसी तरह मेघनाथ वध लिखकर राम को खलनायक बनाने वाले माइकेल मधुसूदन दत्त और ब्रह्मसमाज आंदोलन के संस्थापक राजा राममोहन राय के खिलाफ कट्टर हिंदुत्ववादी हमेशा सक्रिय रहे हैं।

जिस तरह आज अंध विश्वास और कुसंस्कारों को वैदिकी सभ्यता और विशुद्धता के जरिये वैज्ञानिक बताकर कारपोरेट कारोबार का एकाधिकार कायम करने का सिलसिला तकनीकी डिजिटल इंडिया का सच है,उसी तरह उनीसवीं सदी के आठवें दशक में युवा रवींद्रनाथ के समय विज्ञानविरोधी अवैज्ञानिक प्रतिक्रियावादी हिंदुत्व का महिमामंडन अभियान तेज होने लगा था।

हिंदी पत्रकारिता के मसीहा के नेतृत्व में सतीप्रथा से लेकर श्राद्धकर्म और विविध वैदिकी संस्कारों के महिमामंडन के अस्सी के दशक में हिंदी के एक राष्ट्रीय अखबार के विज्ञानविरोधी हिंदुत्व अभियान को याद कर लें तो उनीसवीं सदी के उस सच को महसूस सकते हैं।

हिंदू समाज की तमाम कुप्रथाओं और उसकी पितृसत्तात्मक नस्ली वर्चस्व के खिलाफ एक तरफ नवजागरण और ब्रह्मसमाज आंदोलन तो दूसरी तरफ आदिवासियों और किसानों के जल जंगल जमीन के हकहकूक को लेकर जमींदारों,ईस्ट इंडिया कंपनी और सवर्ण भद्रलोक समाज के खिलाफ एक के बाद एक जनविद्रोह और उसके समांतर पीरफकीर बाउल वैष्णव बौद्ध विरासत के तहत बहुजनों का एकताबद्ध आंदोलन - बौद्धमय भारत के अवसान के बाद मनुस्मृति व्यवस्था की पितृसत्ता और नस्ली वर्चस्व को इससे कठिन चुनौती फिर कभी नहीं मिली है।

इसीकी प्रतिक्रिया में वैदिकी धर्म कर्म संस्कार विधि विधान की वैज्ञानिक व्याख्याएं प्रस्तुत करने का सिलसिला शुरु हुआ और वैदिकी साहित्य का पश्चिमी देशों में पश्चिमी भाषाओं में महिमामंडन का कार्यक्रम भी शुरु हुआ।

कृपया गौर करेंः

Translation functioned as one of the significant technologies of colonial domination in India. In Orientalism, Edward W. Said argues that translation serves "to domesticate the Orient and thereby turn it into a province of European learning" (78). James Mill's The History of British India illustrates Said's point that the Orient is a "representation" and what is represented is not a real place, but "a set of references, a congeries of characteristics, that seems to have its origin in a quotation, or a fragment of a text, or a citation from someone's work on the Orient, or some bit of a previous imagining, or an amalgam of all these" (177). Though Mill had never been to India, he had written three volumes about it by the end of 1817. His History, considered an "authoritative" work on Indian life and society, constructed a version of "Hindoo nature" as uncivilized, effeminate, and barbaric, culled from the translations of Orientalists such as Jones, Williams, Halhed, and Colebrook. Its "profound effect upon the thinking of civil servants" (Kopf 236) and on new generations of Orientalist and other scholars working on India shows how Orientalist translations of "classic" Indian texts facilitated Indians' status as what Said calls "representations" or objects without history.

आगे यह भी गौर तलब हैः

Bankim, on the other hand, constructs a new, manly Bengali vernacular in order to create a new masculine subject. His fictional and non-fictional works redefine the colonized subject and interrogate Western hegemonic myths of supremacy, facilitating the formulation of national identities. Although sharing a similar regional bias and writing during the same era as Bankim, Tagore disavows nationalism.[10] He suggests that nation building itself can be understood as a colonial activity. In Nationalism, a collection of essays, and in the novels Gora and Ghare Baire, Tagore expresses his dissatisfaction with the ideology of nationalism because it erases local cultures and promotes a homogeneous national culture. He demonstrates the violent consequences of Bankim's gendered, upper-caste, Hindu nationalist formulations. Thus, reading Bankim and Tagore together in a course can allow students to see that the historical moment that produced hegemonic nationalist imaginings and from which the contemporary Hindu Right draws sustenance was already divided and already self-critical.

संदर्भःReading Anandamath, Understanding Hindutva: Postcolonial Literatures and the Politics of Canonization

By Chandrima Chakraborty

(McMaster University)

http://postcolonial.org/index.php/pct/article/view/446/841

वैज्ञानिक हिंदू धर्म के नाम से हिंदुत्व के पुनरूत्थान के इस आंदोलन में तबके पढ़े लिखे लोग भी उसीतरह प्रभावित हो रहे थे,जैसे आज पढ़े लिखे तकनीक समृद्ध शहरी कस्बाई लोगों के अलावा मोबाइल टीवी क्रांति से संक्रमित भारत के व्यापक ग्रामीऩ शूद्र,दलित,आदिवासी समाज,स्त्रियां,किसान और मेहनतकश नरसंहारी संस्कृति के संस्थागत फासीवादी नाजी सेना में शामिल हैं।

शशधर तर्कचूड़ामणि,कृष्ण प्रसन्न सेन और चंद्रनाथ बसु जैसे प्रकांड विद्वान लोग इस अवैज्ञानिक विज्ञान विरोधी मनुस्मृति विधान के महिमामंडन का वैज्ञानिक हिंदू धर्म अभियान का नेतृत्व कर रहे थे।

गोमूत्र से लेकर गोबर तक के वैज्ञानिक महिमामंडन के मौजूदा अभियान की तरह तब भी हिंदुओं के चुटिया और तिलक की वैज्ञानिक व्याख्याएं जारी थीं।

तब भी अत्याधुनिक वैज्ञानिक खोजों,नई चिकित्सा पद्धति और नई तकनीक को वैदिकी सभ्यता के आविस्कार बताने की होड़ मची थी।तभी विमान आविस्कार को रामायण के पुष्पक विमान के मिथक से खारिज करते हुए उसे भारतीय वैदिकी सभ्यता की देन बताया जाने लगा था।आज भी विज्ञानविरोधी बाबा बाबियों की बहार है।

वैज्ञानिकों के मुकाबले त्रिकालदर्शी सर्वशक्तिमान मुनि ऋषियों के हिंदुत्व क हथियार से सामाजिक बदलाव के विरुद्ध नवजागरविरोधी बहुजन विरोधी वैज्ञानिक हिंदूधर्म वैसा ही आंदोलन बन गया था जैसे कि मंडल के खिलाफ कमंडल आंदोलन सा सामाजिक न्याय और समानता के बहुजन आंदोलन का हिंदुत्वकरण अस्सी के दशक से आज खिलखलिता हुआ कमल है।

इस अवैज्ञानिक हिंदुत्ववादी नस्ली विमर्श के खिलाफ सभी विधाओं और सभी माध्यमों से रवींद्रनाथ तह वैज्ञानिक दृष्टि के साथ अकेले लड़ रहे थे।

तभी उन्होंने लिखाः

টিকিটি যে রাখা আছে তাহে ঢাকা

ম্যাগনেটিজম্ শক্তি৷

তিলকরেখায় বিদু্যত্ ধায়

তায় জেগে ওঠে ভক্তি \

उनकी जो चुटिया है,उसमें छुपी है

चुंबकीय शक्ति

तिलकरेखा में विद्युत बहे

इसीमे जागे भक्ति

वेद में लिखा सबकुछ सच है और वैदिकी साहित्य ही सच और विज्ञान की कसौटी है,वैदिकी साहित्य और उपनिषदों के स्रोंतों का इस्तेमाल करते हुए रवींद्रनाथ ने अपनी वैज्ञानिक दृष्टि से हिंदुत्व के इस पुनरूत्थान का प्रतिरोध किया और गैर वैदिकी स्रोंतों से प्रतिरोध का साहित्य रचा।उनके गीत,उनकी नृत्यनाटिकाएं वैज्ञानिक हिंदू धर्म के नस्ली वर्चस्व और मनुस्मृति विधान के खिलाफ अचूक हथियार बनते रहे।

जाहिर है कि यह अचानक नहीं है कि महज सोलह साल की उम्र में रवींद्रनाथ ने छद्मनाम भानुसिंह के साथ भानुसिंहेर पदावली लिखकर उत्तर भारत के संत आंदोलन से अपने को जोड़ लिया।अपने बचपन और कैशोर्य में वे नवजागरण और ब्रह्मसमाज के खिलाफ कट्टर हिंदुत्वादियों की मोर्चाबंदी को ब्रह्समाज आंदोलन के केंद्र बने अपने घर जोड़ासांकु से बहुत नजदीक से देख रहे थे रवींद्रनाथ।

मृत्यु से पहले तक रवींद्रनाथ इन्हीं तत्वों के हमलों का निशाना बनना पड़ा और मरने के बाद आज तक वे उन्हीं के निशाने पर हैं।

संघ परिवार ने बंकिम के वंदेमातरम राष्ट्रवाद को संस्थागत संगठन और सांस्कृतिक राजनीति के माध्यम स्वतंत्र भारत का सत्ता समीकरण बना दिया है और इसी वंदेमातरम राष्ट्रवाद के तहत संघ परिवार ने हिटलर का खुल्ला समर्थन किया और ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ भारतीय जनता के एकताबद्ध स्वतंत्रता संग्राम से हिंदुत्ववादियों को अलग रखा है।

हिंदू राष्ट्र सिर्फ संघ परिवार का कार्यक्रम नहीं है।

इस कार्यक्रम को अंजाम देने में मनुस्मृति विधान बहाली की सत्ता वर्ग और वर्ण की सारी ताकतें ईस्ट इंडिया कंपनी के राज के समय से सक्रिय हैं और अब उन्ही ताकतों के किसी गटबंधन से रंगभेद के इस स्थाई बंदोबस्त का अंत नहीं हो सकता।

सत्ता वर्ण वर्ग के प्रतिरोध की यह फर्जी कवायद संघ परिवार के हिंदुत्व एजंडे से कम खतरनाक नहीं है।

हिंदुत्व का पुनरूत्थान के साथ हिंदू राष्ट्र का एजंडा का आरंभ राममंदिर आंदोलन से नहीं हुआ है,आदिवासी किसान बहुजन आंदोलनों के खिलाफ भारत के वर्ग वर्ण सत्तावर्ग के वंदेमातरम गठबंधन का इतिहास यही बताता है।

चैतन्य महाप्रभू के वैष्णव आंदोलन से लेकर ब्रहम समाज आंदोलन,नवजागरण और सूफी संत आंदोलन के खिलाप हिंदुत्व का पुनरूत्थान एक अटूट सिलसिला है।फर्क इतना है कि तब एकमात्र ईस्ट इंडिया कंपनी का राज था और अब डिजिटल इंडिया में हजारों ईस्ट इंडिया कंपनियों का राज है।

आज हम औपनिवेशिक भारत में हिंदुत्व के पुनरूत्थान और इसके खिलाफ रवींद्रनाथ के प्रतिरोध के बारे में सिलसिलेवार चर्चा करेंगे। नये सिरे से संदर्भ समाग्री शेयर करने में बाधाएं हैं,इसलिए फिलहाल मेरे फेसबुक पेज पर अब तक जारी संदर्ब सामग्री से ही काम चला लें।

Monday, September 18, 2017

रवींद्र का दलित विमर्श-28 अंधेर नगरी में सत्यानाश फौजदार का राजकाज! जहाँ न धर्म न बुद्धि नहिं, नीति न सुजन समाज। ते ऐसहि आपुहि नसे, जैसे चौपटराज॥ रवींद्र प्रेमचंद के बाद निशाने पर भारतेंदु? क्या वैदिकी सभ्यता का प्रतीक न होने की वजह से अशोक चक्र को भी हटा देंगे? बंगाल में महिषासुर उत्सव की धूम से नस्ली वर्चस्व के झंडेवरदारों में खलबली हिटलर की नाजी सेना और रवींद्रनाथ के ताशेर घर की अ�

रवींद्र का दलित विमर्श-28
अंधेर नगरी में सत्यानाश फौजदार का राजकाज!
जहाँ न धर्म न बुद्धि नहिं, नीति न सुजन समाज।
ते ऐसहि आपुहि नसे, जैसे चौपटराज॥
रवींद्र प्रेमचंद के बाद निशाने पर भारतेंदु?
क्या वैदिकी सभ्यता का प्रतीक न होने की वजह से अशोक चक्र को भी हटा देंगे?
बंगाल में महिषासुर उत्सव की धूम से नस्ली वर्चस्व के झंडेवरदारों में खलबली
हिटलर की नाजी सेना और रवींद्रनाथ के ताशेर घर की अंत्यज आम अस्पृश्य जनता की पैदल फौजों के दम पर वर्तमान पर कब्जा कर लेने के बाद फासिस्टों के निशाने पर है अतीत और भविष्य,जिन्हें वैदिकी साहित्य और मनुस्मृति विधान के मुताबिक सबकुछ संशोधित करने का अश्वमेध अभियान जारी है।
पलाश विश्वास
डिजिटल इंडिया में इन दिनों जो वेदों,उपनिषदों,पुराणों,स्मृतियों,महाकाव्यों के वैदिकी साहित्य में लिखा है,सिर्फ वही सच है और बाकी भारतीय इतिहास,हड़प्पा मोहंजोदोड़ो सिंधु घाटी की सभ्यता, अनार्य द्रविड़ शक हुण कुषाण खस पठान मुगल कालीन साहित्य, आख्यान, वृत्तांत और विमर्श झूठ हैं।
ब्राह्मण धर्म और मनुस्मृति विधान सच हैं और महात्मा गौतम बुद्ध,उनका धम्म,महात्मा महावीर,गुरु नानक,बसेश्वर,ब्रह्म समाज,नवजागरण,सूफी संत बाउल फकीर आंदोलन झूठ हैं।
हिटलर की नाजी सेना और रवींद्रनाथ के ताशेर घर की अंत्यज आम अस्पृश्य जनता की पैदल फौजों के दम पर वर्तमान पर कब्जा कर लेने के बाद फासिस्टों के निशाने पर है अतीत और भविष्य,जिन्हें वैदिकी साहित्य और मनुस्मृति विधान के मुताबिक सबकुछ संशोधित करने का अश्वमेध अभियान जारी है।
इस हिसाब से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास और भारतीय संविधान और अब तक चला आ रहा कायदा कानून,नागरिक और मानवाधिकार का सफाया तय है तो रवींद्रनाथ,गालिब, प्रेमचंद,पाश, इस्लामी राजकाज,मुसलमान तमाम लेखक,कवि और संत जिनमें शायद जायसी,रहीमदास और रसखान भी शामिल हों निषिद्ध है।
इस हिसाब से गैर वैदिकी राष्ट्रीय प्रतीक अशोक चक्र को देर सवेर हटाने का अभियान चालू होने वाला है।गौरतलब है कि सम्राट अशोक के बहुत से शिलालेखों पर प्रायः एक चक्र (पहिया) बना हुआ है। इसे अशोक चक्र कहते हैं। यह चक्र धर्मचक्र का प्रतीक है। उदाहरण के लिये सारनाथ स्थित सिंह-चतुर्मुख (लॉयन कपिटल) एवं अशोक स्तम्भ पर अशोक चक्र विद्यमान है। भारत के राष्ट्रीय ध्वज में अशोक चक्र को स्थान दिया गया है।भारतीय मुद्रा में बी अशोक चक्र है।अशोक चक्र में चौबीस तीलियाँ (स्पोक्स्) हैं वे मनुष्य के अविद्या से दु:ख बारह तीलियां और दु:ख से निर्वाण बारह तीलियां (बुद्धत्व अर्थात अरहंत) की अवस्थाओं का प्रतिक है।
रवींद्रनाथ की चंडालिका,रक्तकरबी,गीतांजलि,उनके उपन्यासों और निबंधों में राष्ट्रद्रोह पर शोध जारी करने वालों के लिए अगर प्रेमचंद का गोदान,रंगभूमि औकर कर्मभूमि जैसे उपन्यास और सद्गति,ईदगाह,पंच परमेश्वर जैसी कहानियां  खतरनाक हैं तो वाराणसी के भारतेंदु हरिश्चंद्र कम खतरनाक नहीं हैं,जिन्होंने वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति लिखकर राष्ट्रवाद को नये ढंग से परिभाषित किया तो राष्ट्रवाद पर रवींद्रनाथ के भाषणों,निबंधों की तरह अंधेर नगरी में राष्ट्र व्यवस्था का सच बेपर्दा कर दिया और इस पर तुर्रा उन्होंने भारत दुर्दशा भी लिख दिया। आपात काल के दौरान भारतेंदु की ये रचनाएं आम जनता के लिए रंगकर्म की मशालें बन गयी थीं तो नया आपातकाल में इऩसे खतरनाक रचनाएं मिलना मुश्किल है।

तो क्या रवींद्र प्रेमचंद के बाद निशाने पर होंगे भारतेंदु?
रवींद्रनाथ ने राष्ट्रवाद का विरोध पहलीबार 1889 में अपने उपन्यास राजर्षि में किया तो सभ्यता का संकट उनका आखिरी निंबध है,जिसे मई 1941 में उन्होंने शांतिनिकेतन में भाषण बतौर प्रस्तुत किया।जबकि इससे बहुत पहले भारत दुर्दशा नाटक की रचना 1875 इ. में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने की थी। इसमें भारतेन्दु ने प्रतीकों के माध्यम से भारत की तत्कालीन स्थिति का चित्रण किया है। वे भारतवासियों से भारत की दुर्दशा पर रोने और फिर इस दुर्दशा का अंत करने का प्रयास करने का आह्वान करते हैं। वे ब्रिटिशराज और आपसी कलह को भारत दुर्दशा का मुख्य कारण मानते हैं। तत्पश्चात वे कुरीतियाँ, रोग, आलस्य, मदिरा, अंधकार, धर्म, संतोष, अपव्यय, फैशन, सिफारिश, लोभ, भय, स्वार्थपरता, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, अकाल, बाढ़ आदि को भी भारत दुर्दशा का कारण मानते हैं। लेकिन सबसे बड़ा कारण अंग्रेजों की भारत को लूटने की नीति को मानते हैं।
जिस औपनिवेशिक राष्ट्रव्यवस्था का विरोध रवींद्रनाथ और भारतेंदु कर रहे थे,वह आज का निराधार डजिटल बुलेट सामाजिक यथार्थ है।
भारत दुर्दशा के इस दृश्य पर गौर करेंः
तीसरा अंक

स्थान-मैदान
(फौज के डेरे दिखाई पड़ते हैं! भारतदुर्दैव ’ आता है)
भारतदु. : कहाँ गया भारत मूर्ख! जिसको अब भी परमेश्वर और राजराजेश्वरी का भरोसा है? देखो तो अभी इसकी क्या क्या दुर्दशा होती है।
(नाचता और गाता हुआ)
अरे!
उपजा ईश्वर कोप से औ आया भारत बीच।
छार खार सब हिंद करूँ मैं, तो उत्तम नहिं नीच।
मुझे तुम सहज न जानो जी, मुझे इक राक्षस मानो जी।
कौड़ी कौड़ी को करूँ मैं सबको मुहताज।
भूखे प्रान निकालूँ इनका, तो मैं सच्चा राज। मुझे...
काल भी लाऊँ महँगी लाऊँ, और बुलाऊँ रोग।
पानी उलटाकर बरसाऊँ, छाऊँ जग में सोग। मुझे...
फूट बैर औ कलह बुलाऊँ, ल्याऊँ सुस्ती जोर।
घर घर में आलस फैलाऊँ, छाऊँ दुख घनघोर। मुझे...
काफर काला नीच पुकारूँ, तोडूँ पैर औ हाथ।
दूँ इनको संतोष खुशामद, कायरता भी साथ। मुझे...
मरी बुलाऊँ देस उजाडूँ महँगा करके अन्न।
सबके ऊपर टिकस लगाऊ, धन है भुझको धन्न।
मुझे तुम सहज न जानो जी, मुझे इक राक्षस मानो जी।
(नाचता है)
अब भारत कहाँ जाता है, ले लिया है। एक तस्सा बाकी है, अबकी हाथ में वह भी साफ है। भला हमारे बिना और ऐसा कौन कर सकता है कि अँगरेजी अमलदारी में भी हिंदू न सुधरें! लिया भी तो अँगरेजों से औगुन! हा हाहा! कुछ पढ़े लिखे मिलकर देश सुधारा चाहते हैं? हहा हहा! एक चने से भाड़ फोडं़गे। ऐसे लोगों को दमन करने को मैं जिले के हाकिमों को न हुक्म दूँगा कि इनको डिसलायल्टी में पकड़ो और ऐसे लोगों को हर तरह से खारिज करके जितना जो बड़ा मेरा मित्र हो उसको उतना बड़ा मेडल और खिताब दो। हैं! हमारी पालिसी के विरुद्ध उद्योग करते हैं मूर्ख! यह क्यों? मैं अपनी फौज ही भेज के न सब चैपट करता हूँ। (नेपथ्य की ओर देखकर) अरे कोई है? सत्यानाश फौजदार को तो भेजो।
(नेपथ्य में से ‘जो आज्ञा’ का शब्द सुनाई पड़ता है)
देखो मैं क्या करता हूँ। किधर किधर भागेंगे।
(सत्यानाश फौजदार आते हैं)
(नाचता हुआ)
सत्या. फौ : हमारा नाम है सत्यानास।
धरके हम लाखों ही भेस।
बहुत हमने फैलाए धर्म।
होके जयचंद हमने इक बार।
हलाकू चंगेजो तैमूर।
दुरानी अहमद नादिरसाह।
हैं हममें तीनों कल बल छल।
पिलावैंगे हम खूब शराब।
भारतदु. : अंहा सत्यानाशजी आए। आओे, देखो अभी फौज को हुक्म दो कि सब लोग मिल के चारों ओर से हिंदुस्तान को घेर लें। जो पहले से घेरे हैं उनके सिवा औरों को भी आज्ञा दो कि बढ़ चलें।

सत्यानाश फौजदार का राजकाज है।
अतंरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की पत्रिका हिंदी समय में भारतेेंदु की तीनों महत्वपूर्ण रचनाएं भारत दर्दशा,अंधेर नगरी और वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति पढ़ सकते हैं।
सच की कसौटी वैदिकी है और भारत में आदिवासी समाज का सच अगर भारतीय इतिहास का सच नहीं है तो सवाल यह उठता है कि आदिवासियों के भगवान किन्हीं बीरसा मुंडा के पोते की बेटी के यहां खाना खाने का कार्यक्रम क्यों बनाया वैदिकी नस्ली राष्ट्रवाद के सिपाहसालार ने और फिर झारखंड के खूंटी जिले के उलीहातु गांव में  बीरसा वंशज चंपा मुंडा के माटी के घर में फर्श पर टाइल्स लगवाने के बाद परोसा भोजन खाये बिना कैसे लौट आये?
मुंडा विद्रोह की कथा जाहिर है कि वैदिकी साहित्य नहीं है और भक्तजनों ने बांचा भी नहीं होगा लेकिन आदिवासी किसानों के अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ निरंतर संग्राम का इतिहास जिन्होंने पढ़ा होगा,कम से कम जिन्होंने महाश्वेता देवी का लिखा उपन्यास जंगल के दावेदार पढ़ा होगा,उनके लिए उलगुनान की जमीन उलीहातु गांव अनचीन्हा नहीं है।
बीरसा मुंडा के गांव उलीहातु की आड़ में आदिवासी दुनिया  कब्जे के लिए आदिवासियों को उनके घरों से बेधकल करके ईंटों के दड़बे में कैद किया जा रहा है तो उनके इतिहास,उनकी अस्मिता और उनके अस्तित्व को भी जल जंगल जमीन पर उनके हकहकूक,उनकी नागरिकता,उनकी आजीविका,उनकी संस्कृति और उनके नागरिक और मनावाधिकार मनुस्मृति फौजों के अश्वमेधी सेना कुचलती जा रही है और नस्ली वर्चस्व के ब्राह्मणधर्म और वैदिकी संस्कृति के इस अंध राष्ट्रवाद के खिलाफ कुछ भी कहना राष्ट्रद्रोह है और इस जनप्रतिरोध के दमन के लिए दैवी सत्ता का आवाहन है तो इस दैवी सत्ता के खिलाफ आदिवासी आख्यान,वृत्तांत और सामंतवाद साम्राज्यवाद के खिलाफ उनका निरंतर जारी संग्राम का सारा इतिहास वैैदिकी साहित्य के हवाले से खारिज हैं।
संस्कृत में लिखा सबकुछ पवित्र है और तमिल में लिखा साहित्य और इतिहास झूठ है।मनुस्मृति शिकंजे में फंसा हिंदुत्व सच है और इससे बाहर अनार्य असुर अछूतों और आदिवासियों के हजारों साल का इतिहास झूठ है।वैदिकी साहित्य के मिथकों का सच इतिहास है तो बाकी इतिहास मिथक है।
लोक संस्कृति और जनभाषाओं,गैर आर्य गैरहिंदू जनसमुदायों के तमाम आख्यान और वृत्तांत सिर्फ आदि अनंत शाश्वत वैदिकी साहित्य,व्याकरण और सौदर्यशास्त्र की कसौटी में मिथ्या है तो उनकी जीवन यंत्रणा ,उनकी अस्मिता और उनका अस्तित्व भी झूठ है।
रवींद्र नाथ वैदिकी साहित्य और उपनिषदों के आलोक में लिखें तो गुरुदेव ,विश्वकवि और उनके साहित्य का स्रोत बौद्ध दर्शन हो,अनार्य द्रविड़ संस्कृति हो लोकसंस्कृति हो तो उस पर चर्चा निषिद्ध है?
बंगाल में महिषासुर उत्सव को लेकर नस्ली वर्चस्व के झंडेवरदारों में भारी खलबली मची हुई है।यूं तो सैकड़ों सालों से भारत में आदिवासी समाज अपने को असुरों का वंशज मानते हुए नवरात्रि के दौरान शोक मनाता है और महिषासुर उत्सव भी मनाने का सिलसिला भी वर्षों पुराना है।कोलकाता और बंगाल के व्यापक हिस्सों में आदिवासी अछूत और शूद्र जनसमुदाय असुर उत्सव मनाते रहे हैं।इसे लेकर दुर्गोत्सव के दौरान अभी तक किसी टकराव की घटना नहीं हुई है।अब ये हालात सिरे से बदल गये हैं।
जेएनयू में महिषासुर उत्सव के काऱण जेएनयू के छात्रों को संसद से राष्ट्रद्रोही साबित करने के उपक्रम के बाद इसबार बंगाल में महिषासुर और दुर्गा के बारे में आदिवासी आख्यान को पहलीबार वैदिकी साहित्य की कसौटी पर कसते हुए उसका विरोध विद्वतजन कर रहे हैं और संघ परिवार इसे सीधे राष्ट्रविरोधी साबित करने पर तुला हुआ है।आज बांग्ला के प्रमुख दैनिक अखबार एई समये के पहले पेज पर महिषासुर विवाद पर विस्तृत समाचार छपा है।
इसी सिलसिले में फेसबुक पर यह पोस्ट गौर तलब हैः
मेरा सवाल देश के साहित्य जगत के दिग्गजों से हैअब क्या वो चुप रहेंगे??या इसी तरह अभी और बर्बादी देखेंगे???
फूहड़ मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने मुंशी प्रेमचंद को 'केंद्रीय हिंदी संस्थान' से बेदखल किया!
मुंशी प्रेमचंद की कालजयी रचना 'गोदान' को 'केंद्रीय हिंदी संस्थान' ने अपने पाठ्यक्रम से निकाल बाहर फेंका है। 'केहिसं' प्रशासन ने दलील दी है कि उपन्यास की ग्रामीण पृष्ठभूमि और इसमें प्रयुक्त अवधी भाषा का पुट विदेशी छात्रों को समझ में नहीं आता लिहाज़ा उन्हें भारी दिक्कत होती है(!) ग़ौरतलब है कि 'गोदान' न सिर्फ प्रेमचंद प्रतिनिधि रचना के रूप में जाना जाता है बल्कि हिंदी आलोचना के नज़रिये से इसे उनका सबसे महत्वपूर्ण उपन्यास माना गया है। भारतीय भाषाओँ की साहित्यिक पुस्तकों में सर्वाधिक बिक्री के रिकार्ड का तमगा भी इसे ही हासिल है। इतना ही नहीं, विश्व की अन्य भाषाओँ में सबसे ज़्यादा अनुवाद होने वाली भारतीय भाषा की किताब भी 'गोदान' ही है। सन 1936 से लेकर अब तक इसके अन्यान्य प्रकाशनों की तुलना में संख्या की दृष्टि से केवल लियो तोलस्तोय का 'वॉर एंड पीस' ही इसकी टक्कर में खड़ा हो पाता है। 'हिंदी संस्थान की भोथरी राजनीतिक दलील स्पष्ट कर देती है कि मौजूदा शासन में देश की कालजयी रचनाओं का भविष्य सुरक्षित नहीं। ज़रुरत है कि सभी सचेत पाठकों को ऐसी अलोकतांत्रिक कार्रवाईयों का प्रबल विरोध करना चाहिए।
-नथमल शर्मा। Nathmal Sharma SSneha Bava
गौरतलब है कि  इससे पहले वर्तमान पर एकाधिकार नस्ली आधिपत्य कायम करने के बाद हिटलरपंथी संस्थागत  संघ परिवार की  मनुस्मृति विधान की सत्ता राजनीति अतीत को भी वैदिकी आर्य रक्त की विशुद्धता की अपनी विचारधारा के मुताबिक बदलने  के दुस्साहस में लगातार बढ़ रही है। इसलिए न सिर्फ ऐतिहासिक प्रतीकों बल्कि घटनाओं, विवरणों और शख्सियतों को भी पसंद के हिसाब से चुना जा रहा है - उनमें काट छांट की जा रही है।
इसी सिलसिले में सत्ताधारियों के निर्देशानुसार  देश में स्कूली शिक्षा प्रबंधन की केंद्रीय संस्था, एनसीईआरटी ने विषयवार सुझाव मांगे हैं कि किताबों में नई और आवश्यक तब्दीलियां क्या हो सकती हैं। इसी के तहत संघ परिवार से जुड़े संगठन और नेता फौरन हरकत में आ गये।
यह खबर पहले ही आप सभी को मालूम ही होगा कि शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास नामक संगठन ने स्कूली किताबों में आमूलचूल बदलाव की सिफारिशें भेजी हैं। पांच पेज की इन सिफारिशों का लब्बोलुआब ये है कि भारत का इतिहास, हिंदुओं का इतिहास है और जो हिंदू नहीं है या हिंदू धर्म को लेकर कट्टर नहीं है, वो इस इतिहास का हिस्सा नहीं हो सकता है। सिफारिशों का आलम ये है कि मिर्जा गालिब और रवीन्द्रनाथ टैगोर जैसी हस्तियों से जुड़े पाठ भी हटा देने को कहा गया है।


संघ परिवार से  जुड़े न्यास ने एनसीईआरटी को जो सुझाव दिए हैं उनमें कहा गया है कि किताबों में अंग्रेजी, अरबी या ऊर्दू के शब्द न हों, खालिस्तानी चरमपंथियों की गोलियों का शिकार बने विख्यात पंजाबी कवि अवतार सिंह पाश की कविता न हो, गालिब की रचना या टैगोर के विचार न हों, एमएफ हुसैन की आत्मकथा के अंश हटाएं जाएं, राम मंदिर विवाद और बीजेपी की हिंदूवादी राजनीति का उल्लेख न हो, गुजरात दंगों का विवरण हटाया जाए, आदि ,आदि। सिफारिशों के मुताबिक सामग्री को अधिक "प्रेरक” बनाना चाहिए।

Racist fascism would ban Ashoka Chakra soner or later as it does not represent Vedic History or religion! Bengal celebrates Mahishasur Utsav at large level and RSS opposes as it has been trying to brand JNU anti national for Adivasi Bahujan narrative of the destruction of Non Aryan aborigine civilization in India! Anti Adivasi Anti Dalit Anti OBC patriarchal Manusmriti hegemony of blind racist nationalism would soon launch campaign against everything which is not vedic.It is dark digital age of blue whales Killing the idea of India. Palash Biswas

Racist fascism would ban Ashoka Chakra soner or later as it does not represent Vedic History or religion!

Bengal celebrates Mahishasur Utsav at large level and RSS opposes as it has been trying to brand JNU anti national for Adivasi Bahujan narrative of the destruction of Non Aryan aborigine civilization in India!

Anti Adivasi Anti Dalit Anti OBC patriarchal Manusmriti hegemony of blind racist nationalism would soon launch campaign against everything which is not vedic.It is dark digital age of blue whales Killing the idea of India.

Palash Biswas

No automatic alt text available.

Bengali dail Ei Samay has reported on front page today about Mahishasur Utsav celebrated by Indian aborigine Adivasi people and Dalit Bahujan Amebdkarite people.

In Bengal the celbration this year is much organized thanks to Dalit Solidarit Network and Mulnivasi samiti and the people and activists like Saradindu Uddipan,Pijus Pijush Kanti Gayen,David Das,Charan Besra supported by trible people in Bihar,Jharkhand,Orissa and Bengal.

Mass celebration of Mahishasur Utasav by Bahujan Peasantry of Adivasi Peasant Dalit OBC and Muslim communities in Bengal has been noticed by mainstream media.

However,the caste Hindu intelligentsia in Bengal led by Vedic specialists like Nrisingh Bhaduri is dismissed as the Adivasi and Dalit narrative of Asur Anarya civilization destroyed by Aryans with Mythical Durga is not endorsed by Vedic literature.

Anthropologist Pashupati Mahato argues that the Aborigine Adivasi Dalit Bahujan narrative of their plight and their suordination to Arya Brahaminical hegemonial Manusmriti rule should not be included in Vedic literature and it has nothing to do with the credential of such narrative.

Dalit solidarty Network cordinater Saradindu Uddipan has clarified that Mahishasur Utsav has nothing to do with Durgotasav.It is not communal or cultural clash at all.

In fact,it is the continuity of Bahujan folk heritage of Buddhist Baul Vaisnav Bengal of diversity,plurality and fraternity with the history of Baul Faqir Vaisnav Budhhist Jain Sufi combined Bahujan history of Bengal represented by Lalon Fakir,Chaitanya Mahaprabhu,Brahmo Samaj,Bengal Renaissance Peasantry uprisings, ramkrishna,Vivekanand, Rabindra Nath Tagore and Kazi Nazrul Islam.

Nevertheless, RSS is opposing the Mahishasur Utsav as it has been celebrated for years and Bengali people had no objection against tribal and Bahujan narrative and their celebration of life.
But RSS is trying its best to make it an issue for religious communal political polarization as it has already tried to brand antinational JNU for Mahishasur Narrative.

After Rabindra Nath and muslim period of Indian history and icons like Galib and others from the heritage of unity in diversity in India,the fascism of intolerance and apartheidd has excluded the most prminent Hindi writer Premchand.

Bharatendu Harishchandraa wrote Vedic Hinsa Hinsa Na Bhavati,Bharat Durdasha and Andher Nagri Chaupat Raj which might also be branded as ant national sooner or later.

Ashok Chakra might be excluded as it does not represent Vedic history and culture.

Anti Adivasi Anti Dalit Anti OBC patriarchal Manusmriti hegemony of blind racist nationalism would soon launch campaign against everything which is not vedic.It is dark digital age of blue whales Killing the idea of India.

I am addressing these issues in my discourse on Ravindras roots in Bahujan movement led by Adivasi<fakir Baul and peasantry.

Pl share and follow my blogs!

Sunday, September 17, 2017

रवींद्र का दलित विमर्श-27 ताशेर देशःमनुस्मृति व्यवस्था के फासीवाद पर तीखा प्रहार नर्मदा बांध विरोधी आंदोलन के खिलाफ दैवी सत्ता का आवाहन ,हिटलर की आर्य विशुद्धता का सिद्धांत और नरहसंहार कार्यक्रम पलाश विश्वास

रवींद्र का दलित विमर्श-27

ताशेर देशःमनुस्मृति व्यवस्था  के फासीवाद पर तीखा प्रहार

नर्मदा बांध विरोधी आंदोलन के खिलाफ दैवी सत्ता का आवाहन ,हिटलर की आर्य विशुद्धता का सिद्धांत और नरहसंहार कार्यक्रम

पलाश विश्वास

नर्मदा बांध के खिलाफ आदिवासियों और किसानों के आंदोलन का दमन का सिलसिला जारी रखते हुए आज इसे देश के नाम समर्पित करते हुए दावा किया गया कि इसके निर्माण में विदेशी कर्ज की जगह मंदिरों के धन का इस्तेमाल किया गया है।यह दावा किसान आदिवासी विरोधी नर्मदा घाटी की पूरी आबादी को डूब में शामिल करने वाले इस विध्वंसक निर्माण कार्य को धर्म और धर्म स्थल से जोड़ने का विशुद्ध धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद का आवाहन है जिसके तहत प्रकृति और मनुष्यविरोधी इस बड़े बांध के निर्माण का विरोध करने वालों को जनमानस में राष्ट्रद्रोही बनाया जा सके।

हमने रोहिंग्या मुसलमानों की समस्या और उनके मानवाधिकार हनन को समर्थन करने के पश्चिमी धर्मयुद्ध से जनमे राष्ट्रवाद की चर्चा करते हुए राजसत्ता के दैवीसत्ता में बदल  जाने की चर्चा की है।नर्मदा बांध में इसी दैवी सत्ता का आवाहन किया जा रहा है।

रवींद्र नाथ के तासेर घर की फंतासी को रवींद्र के अंध राष्ट्रवाद के विरोध के मद्देनजर फासीवाद के विरोध के रुप में देखा जाता है।विचारधारा के तहत मनुष्यों को अनुशासित सैन्यदल या ताश के पत्तों में बदल देने की फासिस्ट राष्ट्रवाद के खिलाफ यह प्रतिरोध है।

हम मजहबी राजनीति में इस तरह जनसमुदायों को वोटबैंक राजनीति के तहत कार्ड और ट्रंप कार्ड में तब्दील होते देख रहे हैं।इस सिलसिले में हम ओबीसी ट्रंप कार्ड की चर्चा करते रहे हैं तो दलित और मुसलमान ट्रंप कार्डों का चलन शुरु से हो रहा है।

आज भी हम मजहबी सियासत और फासिज्म के राजकाज में मनुष्यों को पैदल सेनाओं में तब्दील होते हुए देख रहे हैं और कार्ड बनते जाने की नियति आज आधार कार्ड से लेकर आटोमेशन,आर्टिफिशियल टैलेंट और रोबोटिक्स का डिजिटल इंडिया का घनघोर वास्तव है जहां नागरिक और मानवाधिकार,मनुष्यता,सभ्यता और नागरिकता निषिद्ध है तो कुलीनों के सिवाय बाकी जनता वध्य है और पूरा देश एक अनंत वधस्थल है।लेकिन ताश के घर में जिस द्वीप राष्ट्र की बात की जा रही है,वहीं की रेजीमेंटेड जनगण की तरह इस नरसंहार संस्कृति के विरुद्ध सन्नाटा है और जीवन यापन उसी विशुद्धता के मनुस्मृति विधान को सख्ती से मानकर चलना है।

फिरभी इसमें वर्णव्यवस्था के नस्ली राष्ट्रवाद और मनुस्मृति व्यवस्था का जो खुल्ला विरोध रवींद्र नाथ ने किया है,उस पर कहीं चर्चा उसी तरह नहीं होती जैसे कि चंडालिका और रक्तकरबी में अस्पृश्यता के खिलाफ मनुष्यता के मुक्तिसंग्राम के बारे में कोई विमर्श नहीं है।चंडालिका में बौद्ध दर्शन की चर्चा होती है तो रक्तकरबी में स्वतंत्रत्रा संघर्ष की चर्चा होती है,लस्ली वर्चस्व की सामाजिक विषमत और इसके विरुद्ध न्याय और समानता के लिए रवींद्र नाथ की रचनाधर्मिता की नहीं।

1933 में इस नृत्यनाटिका का प्रकाशन हुआ और 1933 में ही हिटलर का जर्मनी के शासक के रुप में अभ्युत्थान हुआ लेकिन यहूदियों और कम्युनिस्टों के सफाये के घोषित लक्ष्य को लेकर हिटलर ने नाजी पार्टी की स्थापना 1923 में ही कर दी थी।प्रथम विश्वयुद्ध में जर्मनी की हार के लिए हिटलर ने यहूदियों को उसीतरह जिम्मेदार ठहराया,जिस तरह भारत में ब्रिटिश हुकूमत का साथ देनेवाले हिंदुत्ववादियों की भूमिका को सिरे से नजरअंदाज करके भारत विभाजन के लिए भारत में संस्थागत फासिस्ट रंगभेदी नस्ली राजनीति मुसलमानों को जिम्मेदार ठहराती है।

जिस तरह अच्छे दिन के वायदे और नये खुशहाल बारत के निर्माण के वायदे से भारत में फासिज्म की सत्ता मनुस्मृति व्यवस्था नये सिरे से चलाने में कामयाब हो रही है,ठीक उसीतरह पश्चिम के धर्मयुद्ध मार्फत दैवीसत्ता बहाल करने के नाजी फासी विशुद्धता की  विचारधारा के तहत हिटलर ने जर्मनी को आर्थिक संकट से उबारकर उसका कायाकल्प के तहत युद्धोन्मादी राष्ट्रवाद के तहत जर्मन जनता का समर्थन लूटकर नाजी राजकाज चलाने में कामयाब हो गये।

गौरतलब है कि  हिटलर ने भूमिसुधार करने, वर्साई संधि को समाप्त करने और एक विशाल जर्मन साम्राज्य की स्थापना का लक्ष्य जनता के सामने रखा जिससे जर्मन लोग सुख से रह सकें। इस प्रकार 1922 ई. में हिटलर एक प्रभावशाली व्यक्ति हो गए। उन्होंने स्वस्तिक को अपने दल का चिह्र बनाया जो कि हिन्दुओं का शुभ चिह्र है। वे अपने को विशुद्ध आर्य बताते रहे और इसीलिए भारत में फासिज्म की धर्मोन्मादी विचारधारा के झंडेवरदार शुरु से हिटलर का खुलकर समर्थन करते रहे।

यह फासिज्म हिटलर की विचारधारा के अलावा आर्य सभ्यता और विशुद्धता की उस हिंदुत्व विचारधारा का मिश्रण है,जिसका एजंडा नस्ली रंगभेद के तहत भारत में मनुस्मृति विधान और जाति व्यवस्था के तहत यहूदियों की तरह अछूतों, शूद्रों, किसानों, मेहनतकशों, आदिवासियों, अनार्यों,द्रविड़ों और गैरहिंदू नस्लों के सफाये से हिंदू साम्राज्य स्थापना करने का है।

हिटलर ने  मीन कैम्फ ("मेरा संघर्ष") नामक अपनी आत्मकथा लिखी। इसमें नाजी दल के सिद्धांतों का विवेचन किया। उन्होंने लिखा कि आर्य जाति सभी जातियों से श्रेष्ठ है और जर्मन आर्य हैं। उन्हें विश्व का नेतृत्व करना चाहिए। यहूदी सदा से संस्कृति में रोड़ा अटकाते आए हैं। जर्मन लोगों को साम्राज्यविस्तार का पूर्ण अधिकार है। फ्रांस और रूस से लड़कर उन्हें जीवित रहने के लिए भूमि प्राप्ति करनी चाहिए।

गौरतलब है कि हिटलर का मीन कैम्प भारत के फासिस्ट नस्ली राष्ट्रवादियों का धर्मग्रंथ है।

फासिज्म के खिलाफ निर्मम प्रहार रवींद्रनाथ शुरु से कर रहे थे और तासेर घर की पंतासी में इसी कुलीन तंत्र के वर्चस्ववाद पर उन्होने तीखा प्रहार करते हुए वर्णों की उत्पत्ति के सिद्धांत पर खुला प्रहार किया है।

हमने चंडालिका में अस्पृश्यता के खिलाफ समानता और न्याय के लिए अस्पृश्य चंडाल कन्या चंडालिका के विद्रोह और चंडाल आंदोलन की चर्चा पहले ही की है।बाउल फकीर किसान आदिवासी विद्रोह और भक्ति आंदोलन की बहुजन विरासत की भी हमने सिलसिलेवार चर्चा की है।

मनुष्यता के धर्म,राष्ट्रवाद और सभ्यता के संकट के बारे में चर्चा करते हुए नस्ली वर्चस्व की वजह से भारत में सामाजिक विषमता पर रवींद्रे के दलित विमर्श पर भी हम लगातार फोकस बनाये हुए हैं।

गौरतलब है कि 1930-32 में जर्मनी में बेरोज़गारी बहुत बढ़ गई। संसद् में नाजी दल के सदस्यों की संख्या 230 हो गई। 1932 के चुनाव में हिटलर को राष्ट्रपति के चुनाव में सफलता नहीं मिली। जर्मनी की आर्थिक दशा बिगड़ती गई और विजयी देशों ने उसे सैनिक शक्ति बढ़ाने की अनुमति की। 1933 में चांसलर बनते ही हिटलर ने जर्मन संसद् को भंग कर दिया, साम्यवादी दल को गैरकानूनी घोषित कर दिया और राष्ट्र को स्वावलंबी बनने के लिए ललकारा। हिटलर ने डॉ॰ जोज़ेफ गोयबल्स को अपना प्रचारमंत्री नियुक्त किया। नाज़ी दल के विरोधी व्यक्तियों को जेलखानों में डाल दिया गया। कार्यकारिणी और कानून बनाने की सारी शक्तियाँ हिटलर ने अपने हाथों में ले ली। 1934 में उन्होंने अपने को सर्वोच्च न्यायाधीश घोषित कर दिया। उसी वर्ष हिंडनबर्ग की मृत्यु के पश्चात् वे राष्ट्रपति भी बन बैठे। नाजी दल का आतंक जनजीवन के प्रत्येक क्षेत्र में छा गया। 1933 से 1938 तक लाखों यहूदियों की हत्या कर दी गई। नवयुवकों में राष्ट्रपति के आदेशों का पूर्ण रूप से पालन करने की भावना भर दी गई और जर्मन जाति का भाग्य सुधारने के लिए सारी शक्ति हिटलर ने अपने हाथ में ले ली।हिटलर ने 1933 में राष्ट्रसंघ को छोड़ दिया और भावी युद्ध को ध्यान में रखकर जर्मनी की सैन्य शक्ति बढ़ाना प्रारंभ कर दिया। प्राय: सारी जर्मन जाति को सैनिक प्रशिक्षण दिया गया।

इस पूरी अवधि के दौरान भारत के न्सली राष्ट्रवादियों का हिटलर और जर्मनी के साथ नाभिनाल का संबंध रहा है।

रक्त करबी और चंडालिका में जहां किसानों और मेहनतकशों के अस्पृश्य, वंचित, अपमानित,उत्पीड़त वर्ण वर्ग की मनुष्यता की मुक्ति का महासंग्राम है,वही रवींद्रनाथ की नृत्यनाटिका ताशेर घर में सत्ता वर्ग की संरचना और सामाजिक विषमता का तानाबाना है जो मुकम्मल मनुस्मृति व्यवस्था है,उसका सामाजिक यथार्थ पर तीखे प्रहार है।

रवींद्र नाथ ने अपनी कहानी एकटि आषाढ़े गल्प को नृत्यनाटिका का रुप दिया और 1933 में इसे प्रकाशित करते हुए नेताजी सुभाष चंद्र के नाम उत्सर्गित कियाः

তাসের দেশ. উৎসর্গ কল্যাণীয় শ্রীমান সুভাষচন্দ্র, স্বদেশের চিত্তে নূতন প্রাণ সঞ্চার করবার পুণ্যব্রত তুমি গ্রহণ করেছ, সেই কথা স্মরণ ক'রে তোমার নামে 'তাসের দেশ' নাটিকা উৎসর্গ করলুম। শান্তিনিকেতন রবীন্দ্রনাথ ঠাকুর

गौरतलब है कि रवींद्र के अवसान के बाद आजादी के लिए भारत छोड़ने से पहले तक नेताजी सुभाषचंद्र बंगाल में हिंदुत्ववादियों के फासीवादी राष्ट्रवाद को सबसे बड़ा खतरा मानते हुए उसका लगातार प्रतिरोध करते रहे हैं।

इसका कथानक रवींद्र ने एकटि आषाढ़े गल्प में लिखा है,जिसकी शुरुआत में भारतीय समाज की प्रगतिविरोधी आदिम बर्बर संरचना का खुलासा उन्होंने इस प्रकार किया है जिसमें ब्रह्मा के मुख से विशुद्ध कुलीन तंत्र का जन्म बताया जाता हैः

দূর সমুদ্রের মধ্যে একটা দ্বীপ । সেখানে কেবল তাসের সাহেব , তাসের বিবি , টেক্কা এবং গোলামের বাস । দুরি তিরি হইতে নহলা-দহলা পর্যন্ত আরো অনেক-ঘর গৃহস্থ আছে, কিন্তু তাহারা উচ্চজাতীয় নহে ।

টেক্কা সাহেব গোলাম এই তিনটেই প্রধান বর্ণ, নহলা-দহলারা অন্ত্যজ- তাহাদের সহিত এক পঙ্‌ক্তিতে বসিবার যোগ্য নহে ।

কিন্তু, চমৎকার শৃঙ্খলা । কাহার কত মূল্য এবং মর্যাদা তাহা বহুকাল হইতে স্থির হইয়া গেছে , তাহার রেখামাত্র ইতস্তত হইবার জো নাই । সকলেই যথানির্দিষ্ট মতে আপন আপন কাজ করিয়া যায়। বংশাবলিক্রমে কেবল পূর্ববর্তীদিগের উপর দাগা বুলাইয়া চলা ।

সে যে কী কাজ তাহা বিদেশীর পক্ষে বোঝা শক্ত । হঠাৎ খেলা বলিয়া ভ্রম হয় । কেবল নিয়মে চলাফেরা , নিয়মে যাওয়া-আসা , নিয়মে ওঠাপড়া । অদৃশ্য হস্তে তাহাদিগকে চালনা করিতেছে এবং তাহারা চলিতেছে ।

তাহাদের মুখে কোনো ভাবের পরিবর্তন নাই । চিরকাল একমাত্র ভাব ছাপ মারা রহিয়াছে । যেন ফ্যাল্‌-ফ্যাল্‌ ছবির মতো । মান্ধাতার আমল হইতে মাথার টুপি অবধি পায়ের জুতা পর্যন্ত অবিকল সমভাবে রহিয়াছে ।

কখনো কাহাকেও চিন্তা করিতে হয় না , বিবেচনা করিতে হয় না ; সকলেই মৌন নির্জীবভাবে নিঃশব্দে পদচারণা করিয়া বেড়ায় ; পতনের সময় নিঃশব্দে পড়িয়া যায় এবং অবিচলিত মুখশ্রী লইয়া চিৎ হইয়া আকাশের দিকে তাকাইয়া থাকে ।

কাহারো কোনো আশা নাই , অভিলাষ নাই , ভয় নাই, নূতন পথে চলিবার চেষ্টা নাই , হাসি নাই , কান্না নাই , সন্দেহ নাই , দ্বিধা নাই । খাঁচার মধ্যে যেমন পাখি ঝট্‌পট্‌ করে , এই চিত্রিতবৎ মূর্তিগুলির অন্তরে সেরূপ কোনো-একটা জীবন্ত প্রাণীর অশান্ত আক্ষেপের লক্ষণ দেখা যায় না ।

অথচ এককালে এই খাঁচাগুলির মধ্যে জীবের বসতি ছিল — তখন খাঁচা দুলিত এবং ভিতর হইতে পাখার শব্দ এবং গান শোনা যাইত । গভীর অরণ্য এবং বিস্তৃত আকাশের কথা মনে পড়িত । এখন কেবল পিঞ্জরের সংকীর্ণতা এবং সুশৃঙ্খল শ্রেণী-বিন্যস্ত লৌহশলাকাগুলাই অনুভব করা যায়— পাখি উড়িয়াছে কি মরিয়াছে কি জীবন্মৃত হইয়া আছে , তাহা কে বলিতে পারে ।

আশ্চর্য স্তব্ধতা এবং শান্তি । পরিপূর্ণ স্বস্তি এবং সন্তোষ । পথে ঘাটে গৃহে সকলই সুসংহত , সুবিহিত — শব্দ নাই , দ্বন্দ্ব নাই , উৎসাহ নাই , আগ্রহ নাই — কেবল নিত্য-নৈমিত্তিক ক্ষুদ্র কাজ এবং ক্ষুদ্র বিশ্রাম ।

সমুদ্র অবিশ্রাম একতানশব্দপূর্বক তটের উপর সহস্র ফেনশুভ্র কোমল করতলের আঘাত করিয়া সমস্ত দ্বীপকে নিদ্রাবেশে আচ্ছন্ন করিয়া রাখিয়াছে — পক্ষীমাতার দুই প্রসারিত নীলপক্ষের মতো আকাশ দিগ্‌দিগন্তের শান্তিরক্ষা করিতেছে । অতিদূর পরপারে গাঢ় নীল রেখার মতো বিদেশের আভাস দেখা যায় — সেখান হইতে রাগদ্বেষের দ্বন্দ্বকোলাহল সমুদ্র পার হইয়া আসিতে পারে না ।

नृत्य नाटिका में कुलीन तंत्र के सत्ता वर्म वर्ग की उत्पत्ति के बारे में  साफ तौर पर कहा गया हैः

সদাগর। তোমাদের উৎপত্তি কোথা থেকে।

ছক্কা। ব্রহ্মা হয়রান হয়ে পড়লেন সৃষ্টির কাজে। তখন বিকেল বেলাটায় প্রথম যে হাই তুললেন, পবিত্র সেই হাই থেকে আমাদের উদ্‌ভব।

পঞ্জা। এই কারণে কোনো কোনো ম্লেচ্ছভাষায় আমাদের তাসবংশীয় না বলে হাইবংশীয় বলে।

সদাগর। আশ্চর্য।

ছক্কা। শুভ গোধূলিলগ্নে পিতামহ চার মুখে একসঙ্গে তুললেন চার হাই।

সদাগর। বাস্‌ রে। ফল হল কী।

ছক্কা। বেরিয়ে পড়ল ফস্‌ ফস্‌ করে ইস্কাবন, রুইতন, হরতন, চিঁড়েতন। এঁরা সকলেই প্রণম্য। (প্রণাম)

রাজপুত্র। সকলেই কুলীন?

ছক্কা। কুলীন বৈকি। মুখ্য কুলীন। মুখ থেকে উৎপত্তি।

भारत का प्राचीन नाम जम्बू द्वीप है और ताशों का यह देश भी समुद्र से घिरा एक द्वीप है जहां कुलीन वर्ण वर्ग की सत्ता है।साहब बीवी गुलाम और इक्का का सत्तावर्ग और कुलीन तंत्र है और अश्पृश्य अंत्यजों का व्रात्य बहुजन समाज नहला दहला वगैरह वगैरह है।जहां मनुस्मृति विधान के कठोर अनुशासन में जीवन बंधा है।वहां विचारों,सपनों,आशा,आकांक्षा या अभिव्यक्ति की कोई स्वतंत्रता नहीं है।जीवन में अचलावस्था है और समामाजिक परिवर्तन की कोई स्थिति नहीं है।

आज ही नर्मदा बांध देश को समर्पित कर दिया गया है।जल जंगल जमीन आजीविका नागरिक और मानवाधिकार से किसानों और मेहनतकशों की अनंत बेदखली में यह देश डिजिटल इंडिया वही ताशों का देश है,जहां राजनीति मुखर है और सामाजिक शक्तियां मौन है और आम जनता का सफाया का अटूट मनुस्मृति तंत्र वर्ण वर्ग वर्चस्व का सैन्य राष्ट्र है।

आज हम सिलसिलेवार इस पर चर्चा करेंगे।इससे पहले ताशेर देश नृत्यनाटिका का मूल पाठ हमने अपने फेसबुक पेज पर शेयर कर दिया है।बाकी संदर्भ सामग्री भी वहीं शेयर कर रहे हैं।तकनीकी कारणों से हम इसे समूहों में शेयर नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि रवींद्र दलित विमर्श सत्ता वर्ग के लिए निषिद्ध विषय है।

बांग्लादेशी अखबार डेली स्टार में इस नाटक के एक हालिया मंचन पर  समीक्षक करीम वहीद का यह आलेख जरुर पढ़ लेंः

Life Lessons from a Deck of Cards

Tagore's "Tasher Desh" in a new light

Karim Waheed

The production was a smash hit with the audience. It offered Tagore's work in a package that reached out to a wider group of people. Photo: Mumit M.

Rabindranath Tagore wrote "Tasher Desh" (Land of Cards) 78 years ago, in the context of British India. This dance-drama is a satire on the rigidity of class systems, both Indian and British, employing the dramatic and comedic device of a land of cards where a population is trapped in countless, inane rituals. But has this satire/fantasy managed to retain its pertinence after almost eight decades?

As part of its 'Rediscovering Tagore' festival, celebrating the 150th birth anniversary of the Nobel laureate poet, British Council presented "Tasher Desh" at National Theatre Hall, Bangladesh Shilpakala Academy in Dhaka on April 22. The Daily Star is the communication partner of the festival.

Of all the components of the festival, this was hands down the most ambitious project undertaken by British Council. This was way more than a dance-drama, it was a 'dance-opera', a magnum opus if you will, executed by Shadhona (A Centre for Advancement of South Asian Culture), and presented a fusion of diverse dance forms -- Manipuri (one of the classical Indian forms), Chhau (indigenous to Bengal) and Western Contemporary. Directed by accomplished Bangladeshi dancer Warda Rihab, the production was jointly choreographed by Rihab and Rachel Krische (known for her expertise in contemporary dance) from UK. Biren Kalindi and Jagannath Chowdhury (from Purulia, India) choreographed the Chhau movements.

Shadhona experimented with the music as well. Under the direction of famed new age percussionist Tanmoy Bose, the vocal cast included traditionally trained Rabindra Sangeet singers like Nandita Yasmin, Lopamudra Mitra and contemporary/indie vocalists, Shayan Chowdhury Arnob, Anusheh Anadil and Rupankar Bagchi.

After a brief speech by Information and Cultural Affairs Minister Abul Kalam Azad, the curtains went up. Before the actual play rolled out, choreographers Rihab and Krische, surrounded by dancers, presented a jugalbandi of contemporary and Manipuri to the song "Khoro Bayu Boi Begey". I was impressed but keener on seeing the two forms mesh during the play.

The Plot: Tired of the monotonous palace life, a prince wants to set out on a voyage. He is accompanied by his mate/sidekick, a merchant. They encounter a tempest. After a shipwreck, the duo find themselves in a land where seemingly ridiculous rules and disciplines reign supreme. Abidance to strict rules in daily lives has taken away basic human qualities like emotions. There is no place for the desires of the heart. Life in this country is literally like a game of cards -- all rules -- and nothing is spontaneous. The denizens, aptly, resemble cards.

The arrival of the two foreigners who advocate free will cause an upheaval and soul searching in this land of cards, and gradually one after another, the cards shed their lifeless, zombie-like identities -- appearing very human.

Wow Factors: The masked Chhau dancers from Purulia. From the moment they appeared on the stage, these dancers had the audience in their puppet-like grips. They were brilliant, magical, and impossible to look away from. In fact, all the dancers went above and beyond to make this production a rousing success. Music direction by Tanmoy Bose offered fresh, new sounds to the ever-familiar Tagore songs. Veteran dancers Laila Hasan (as the Queen Mother) and Lubna Marium (Queen of the Cards) added depth to this innovative production. Nandita Yasmin's impassioned rendition embodied everything Tagore said and left unsaid. Costumes by Neelay (Odissi Vision & Movement Centre - Kolkata), Shalonkara, Shama razzled and dazzled.

What Didn't Quite Work: As a hardcore admirer of Anusheh Anadil's vocal prowess, I didn't find myself drawn to her rendition of "Gharetey Bhromor Elo Gunguniye". Anusheh's bold, throaty vocals didn't do justice to the song that called for romance and playfulness. But the singer did make up for that with her rendition of "Bijaymala Eno Amar Lagi". Warda Rihab's strong suit, her years of Manipuri training, seemed to have become her limitation when executing the contemporary moves. The problem is contemporary dance involves a lot of improvisation, and often short bursts of energetic movements like lifts, that go against the principle of traditional Manipuri dance that embodies delicate and graceful movements. Manipuri dance avoids sudden movements, sharp edges or straight lines. Mastering contemporary dance and seamlessly mingling it with Manipuri in just three weeks is a Herculean task, considering professional contemporary training usually takes three/four years.

On the whole, however, the production was a smash hit with the audience. It offered Tagore's work in a package that reached out to a wider group of people -- the cheering full-house was evidence to that. Through this, British Council has successfully rediscovered Tagore and as many discerning music/dance enthusiasts suggested, this production should be staged again, aired on TV and recording of it should be released in DVD format. A music album featuring the songs should be made available as well.

Now going back to the question regarding relevance of this dance-drama (presented in the intro) to modern times: Unless we manage to turn this world into a utopia, the bard's message remains absolutely pertinent.