Friday, September 8, 2017

रवींद्र का दलित विमर्श-19 लालन फकीर का मनेर मानुष गीतांजलि का प्राणेर मानुष। ज्यों-की -त्यों धरि दीन्हीं चदरिया।। संत कबीर को समझे तो रवींद्र और लालन फकीर को भी समझ लेंगे। पलाश विश्वास

रवींद्र का दलित विमर्श-19

लालन फकीर  का मनेर मानुष गीतांजलि का प्राणेर मानुष।

ज्यों-की -त्यों धरि दीन्हीं चदरिया।।

संत कबीर को समझे तो रवींद्र और लालन फकीर को भी समझ लेंगे।

पलाश विश्वास

बौद्धमय बंगाल का अवसान ग्यारहवीं शताब्दी में हुआ।आठवीं सदी से लेकर ग्यारहवीं सदी तक बंगाल में बौद्ध पाल राजाओं का शासन रहा जिसका ग्यारहवीं सदी में सेन वंश के अभ्युत्थान के साथ अंत हुआ।सेन वंश के राजा बल्लाल सेन के शासनकाल में बंगाल में ब्राह्मण धर्म का प्रचलन हुआ लेकिन सेन वंश के शासन का अंत तेरहवीं सदी में हो गया।बंगाल में पठान सुल्तानों,हिंदू राजाओं और बारह भुइयां के साथ शूद्र और आदिवासी राजाओं का राजकाज अलग अलग क्षेत्र में चला।

बंगाल प्राचीन काल में आर्यों के लिए निषिद्ध रहा है और इसे असुरों का देश माना गया है।

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The history of Bengal includes modern-day Bangladesh and West Bengal in the eastern part of the Indian subcontinent, at the apex of the Bay of Bengal and dominated by the fertile Ganges delta. The advancement of civilization in Bengaldates back four millennia.[1] The region was known to the ancient Greeks and Romans as Gangaridai. The Ganges and the Brahmaputra rivers act as a geographic marker of the region, but also connect it to the broader Indian subcontinent.[2] Bengal, at times, has played an important role in the history of the Indian subcontinet.

Etymology


The exact origin of the word Bangla is unknown, though it is believed to be derived from the Dravidian-speaking tribe Bang/Banga that settled in the area around the year 1000 BCE.[12][13] Other accounts speculate that the name is derived from Venga (Bôngo), which came from the Austric word "Bonga" meaning the Sun-god. According to the Mahabharata, the Puranas and the Harivamsha, Vanga was one of the adopted sons of King Vali who founded the Vanga Kingdom. It was either under Magadh or under Kalinga Rules except few years under Pals.The Muslim accounts refer that "Bong", a son of Hind (son of Hām who was a son of Prophet Noah/Nooh) colonised the area for the first time.[14] The earliest reference to "Vangala" (Bôngal) has been traced in the Nesari plates (805 CE) of Rashtrakuta Govinda III which speak of Dharmapala as the king of Vangala. The records of Rajendra Chola I of the Chola dynasty, who invaded Bengal in the 11th century, speak of Govindachandra as the ruler of Vangaladesa.[15][16][17] Shams-ud-din Ilyas Shah took the title "Shah-e-Bangla" and united the whole region under one government.

Some references indicate that the primitive people in Bengal were different in ethnicity and culture from the Vedic people beyond the boundary of Aryavarta and who were classed as "Dasyus". The Bhagavata Purana classes them as sinful people while Dharmasutra of Baudhayana prescribes expiatory rites after a journey among the Pundras and Vangas. Mahabharataspeaks of Paundraka Vasudeva who was lord of the Pundras and who allied himself with Jarasandha against Krishna. The Mahabharata also speaks of Bengali kings called Chitrasena and Sanudrasena who were defeated by Bhima and Kalidasamentions Raghu defeating a coalition of Vanga kings.

अनार्य असुरों के बंगाल में सेन वंश के राजकाज के दौरान  पहले शैब और शाक्तधर्म का प्रचलन रहा है,जो वैदिकी सभ्यता के दायरे से बाहर अनार्य संस्कृति हैं।सेन वंश के अंतिम राजा लक्ष्मण सेन के सभाकवि जयदेव के गीतगोविंदम् से बंगाल में बाउल और वैष्णव धर्म का प्रचलन हुआ जो ब्राह्मण धर्म और पुरोहित तंत्र के साथ साथ दैवी सत्ता के खिलाफ हैं।

तेरहवीं सदी से इस्लामी राजकाज और सेन वंश के शासन के दौरान बड़े पैमाने पर बौद्धों और अनार्यों असुरों के हिंदुत्वकरण और हिंदुत्वकरण के तहत जाति व्यवस्था को अस्वीकार करने के कारण इस्लाम में धर्मांतरण की वजह से बंगाल में साझा संस्कृति का जन्म हो गया।यह साझा संस्कृति वैष्णव बाउल,बौद्ध और इस्लाम के सूफी पंथ के मुताबिक मनुष्यता का धर्म है,जो सामंती और दैवी सत्ताओं को सिरे से नामंजूर करता है।

रवींद्र साहित्य और दर्शन में इसी साझा बाउल फकीर संस्कृति  का सबसे ज्यादा असर है,जिसके तहत आध्यात्म का अर्थ मनुष्य देह में बसी अंतरात्मा की खोज के तहत मनुष्यता के उत्कर्ष का अनुसंधान है.जो धर्म सत्ता और राजसत्ता दोनों के विरुद्ध है।प्राचीन काल से बंगाल में अनार्यों,असुरों के जनपद रहे हैं।

फिर अंग्रेजी हुकूमत के दौरान भी आदिवासी और शूद्र शासक निरंकुश सत्ता की राष्ट्रव्यवस्था के खिलाफ लड़ते रहे हैं।इसलिए राजसत्ता का विरोध इस आध्यात्म के अंतर्गत है।

इस्लामी शासन के दौरान बाकी भारत में भी राजसत्ता और दैवी सत्ता दोनों के विरुद्ध हिंदू मुस्लिम एकता की साझा विरासत के तहत संतों और सूफी फकीरों का आंदोलन जारी रहा है।बंगाल में इन सूफी फकीरों का असर बहुजन संस्कृति पर सबसे ज्यादा रहा है,जिसमें बौद्ध,वैष्णव,बाउल और सूफी धर्म समाहित है।

इस परंपरा के सबसे बड़े बाउल फकीर लालन फकीर रहे हैं।

लालन फकीर लालन साँई के नाम से मशहूर हैं।इसे लेकर विवाद है कि रवींद्रनाथ की उनसे कभी मुलाकात हुई या नहीं हुई।पूर्वी बंगाल में टैगोर परिवार की जमींदारी सिलाईदह में थी,जहां युवा रवींद्रनाथ जमींदारी के कामकाज के सिलिसिले में जाया करते थे।रवींद्र की युवावस्था में ही लालन फकीर का निधन हो गया और तब उनकी आयु 116 साल के करीब बतायी जाती है।इसलिए संभावना यही है कि सिलाईदह से नजदीक लालन का अखाड़ा होने के बावजूद इन दोनों की शायद मुलाकात नहीं हुई होगी।लेकिन लालन के अनुयायियों के संपर्क में थे रवींद्र।लालन ने खुद अपने गीतों को लिपिबद्ध नहीं किया,उनके अनुयायियों ने उनके गीतों को संकलित किया और उन्हीं के मार्फत वे गीत रवींद्र तक पहुंचे।जिनके बारे में रवींद्र ने बार बार चर्चा की है।

लालन फकीर मानवतावादी थे और जाति धर्म नहीं मानते थे।मनुष्यता का धर्म उनका धर्म था और वे अपने अतःस्थल में ही ईश्वर का अनुसंधान करते थे और यही अनुसंधान  उऩकी साधना थी।उनका गीत हैः

'ডানে বেদ, বামে কোরান,

মাঝখানে ফকিরের বয়ান,

যার হবে সেই দিব্যজ্ঞান

সেহি দেখতে পায় ।'

(दाहिने वेद,बाँए कुरान,

बीच में फकीर का बयान

जिसको होगा वह दिव्यज्ञान

वही देख सके हैं)

यह भारत की सूफी और संत परंपरा की साझा विरासत है।

रवींद्र रचना में इसी दिव्यज्ञान की झलक हैः

'সীমার মাঝে, অসীম, তুমি

বাঁজাও আপন সুর।

আমার মধ্যে তোমার প্রকাশ

তাই এত মধুর।

কত বর্ণে কত গন্ধে

কত গানে কত ছন্দে,

অরূপ, তোমার রূপের লীলায়

জাগে হৃদয়পুর।'

(सीमा के मध्य,असीम,तुम्हीं

बजाओ अपना सुर

मेरे बीतर तुम्हारी अभिव्यक्ति

इसीलिए इतना मधुर।

कितने रंगों में,कितने गंध में

कितने गीतों में कितने छंद में

अरुप तुम्हारे रुप की लीला में

जागे ह्रदयपुर)

ब्रह्म समाज के निराकार ईश्वर हिंदू मुस्लिम संत सूफी परंपरा में फिर वही निराकार हैं,जिसे अपने अंतःस्थल में देखते हैं लालन फकीर और रवींद्रनाथ दोनों।लालन फकीर की कोई धार्मिक पहचान उसीतरह नहीं है,जैसे संत कबीर की नहीं थी।संत कबीर का ईश्वर भी निराकार था।

कबीर का धर्म भी मनुष्यता का धर्म है।संत रविदास के लिए कठौती में ही गंगा है।सूफी संतों की वाणी में समानता और न्याय की गूंज अनुगूंज है और वे मनुष्य में ही ईश्वर को देखते हैं।

रवींद्रनाथ सदाचार को भारत की सभ्यता मानते थे और सभ्यता केइतिहास में उन्होंने पश्चिमी सभ्यता के प्रतिमानों को खारिज करते हुए सदाचार की भारतीय संस्कृति को ही भारत की सभ्यता बताते हैं।भारत में संत और सूफी आंदोलन में सदाचार ही मनुष्यता की उत्कृष्टता की कसौटी है।लालन फकीर और संत कबीर दास सदाचार का आदर्श बताते हैं तो यही सदाचार फिर गांधी का दर्शन है।

जाति धर्म के भेदभाव के खिलाफ लालन फकीर और संत कबीर दोनों तीखे प्रहार करते हैं तो अस्पृश्यता के नस्ली रंगभेद की विषमता को भारत की मुख्य समस्या मानने वाले रवींद्र नाथ जल को जीवन का आधार मानकर अस्पृश्यता के खिलाफ जलदान के अधिकार को लेकर चंडालिका लिखते हैं।

बंगाल के बाउल धर्म की गूंज कबीर दास की रचना में हैः

झीनी -झीनी बीनी चदरिया।

काहे कै ताना,काहे कै भरनी,

कौन तार से बीनी चदरिया।।

इंगला पिंगला ताना भरनी,

सुषमन-तार से बीनी चदरिया।।

आठकंवल दल चरखा डोलै,

पांच तत्त गुन तीनि चदरिया।।

साँई को सियत मास दस लागे,

ठोंक ठोंक के बीनी चदरिया।।

सो चादर सुर नर मुनि ओढ़ी,

ओढ़ि के मैली कीन्हीं चदरिया।।

दास कबीर जतन सौं ओढ़ी,

ज्यों-की -त्यों धरि दीन्हीं चदरिया।।

  रवींद्र नाथ पर संत कबीर का भी गहरा असर है,जिसका हम अलग से चर्चा करेंगे।सफी बाउल संतों की तरह कबीर पर बी बौद्ध दर्शन का असर है,इसकी भी आगे चर्चा करेंगे।

रवींद्र लालन प्रसंग में कबीर दास के संदर्भ बाउल संत परंपरा की साझा विरासत को समझने में हिंदी पाठकों के लिए मददगार साबित हो सकती है।

सूफी परंपरा के बारे में कमोबेश जानकारी और समझ होने के बावजूद हिंदी के आम पाठकों को बंगाल के बाउल फकीरों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है।

लालन फकीर के देहत्तव,उनकी धर्मनिरपेक्षता,समता और न्याय की उनकी पक्षधरता और समंतवाद के किलाप उनके प्रतिरोध,जाति धर्म के आधार पर भेदभाव और पुरोहित मुल्ला तंत्र पर  कड़े प्रहार,मनुष्यता के धर्म कबीर और नानक के साहित्य और बाकी भारत की साझा विरासत के मुताबिक हैं।

कबीर दास की रचनाओं से आम पाठक काफी हद तक परिचित हैं,इसलिए हम रवींद्र लालन प्रसंग में कबीर का उल्लेख कर रहे हैं।

आप कबीर को समझते हैं तो लालन फकीर को समझने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए।लालन फकीर के दर्शन को समाने लाने में रवींद्रनाथ ने ही पहल की थी।लालन फकीर का एकमात्र चित्र जो उपलब्ध है,वह ज्योतिंद्रनाथ टैगोर ने बनायी  है,जिसके आधार पर रवींद्र और लालन की मुलाकात की किंवदंती प्रचलित हो गयी।लालन फकीर के बीस गीतों का प्रकाशन रवींद्रनाथ ने 1905 में प्रवासी पत्रिका में कराया।इसे साहित्य की अमूल्य संपदा बतौर प्रकाशित किया गया।

বিশ্বকবি রবীন্দ্রনাথের নিজের ভাষায় - 'আমার লেখা যারা পড়েছেন, তাঁরা জানেন বাউল পদাবলীর প্রতি আমার অনুরাগ আমি অনেক লেখায় প্রকাশ করেছি। শিলাইদহে যখন ছিলাম, বাউল দলের সঙ্গে আমার সর্বদাই দেখা সাক্ষাৎ ও আলাপ- আলোচনা হতো। আমার অনেক গানে আমি বহু সুর গ্রহন করেছি এবং অনেক গানে অন্য রাগরাগিনীর সাথে আমার জ্ঞাত বা অজ্ঞাতসারে বাউল সুরের মিল ঘটেছে। এর থেকে বোঝা যাবে, বাউলের সুর ও বানী কোন এক সময় আমার মনের মধ্যে সহজ হয়ে মিশে গেছে। আমার মনে আছে, তখন আমার নবীন বয়স- শিলাইদহ (কুস্টিয়া) অঞ্চলের এক বাউল একতারা হাতে বাজিয়ে গেয়েছিল -


'কোথায় পাবো তাঁরে - আমার মনের মানুষ যেঁরে।

হারায়ে সেই মানুষে- তাঁর উদ্দেশে

দেশ বিদেশে বেড়াই ঘুরে ।'


(এই গানটি গেয়েছিল-ফকির লালন শাহের ভাবশিষ্য গগন হরকরা। যার আসল নাম বাউল গগনচন্দ্র দাস।)

रवींद्रनाथ ने लिखा हैः मेरा लिखा जिन्होंने पढ़ा है,वे जानते हैं कि बाउस पदावली से मुझे किस हद तक प्रेम है,जनिके बारे में मैंने अपने अनेक लेखों में लिखा है।मैं जब सिलाईदह में था,बाउलों के दल के साथ मेरी हमेशा मुलाकात बातचीत हुआ करती थी।मैंने अपने अनेक गीतों में उनके अनेक सुरों को अपनाया है और दूसरे अनेक गीतों में दूसरी राग रागिनियों के सात मेरे जाने अनजाने में बाउल सुर मिल गया है।इसीसे समझा जा सकता है कि बाउल सुर और वाणी मेरे मन में कितनी सहजता के साथ एकाकार हैं।मुझे याद है कि जब मेरी उम्र कम थी,सिलाईदह (कुष्टिया) इलाके में एक बाउल ने हाथों में इकतारा बजाते हुए गाया था-

कहां मिलेगा वह-मेरे अंतःस्थल का मानुष जो

उस मानुष को खोकर-उसीकी खोज में

देश विदेश भटकूं मैं।

लालन फकीर के इस गीत को गा रहे थे उन्ही के अनुयायी गगन हरकरा।

लालन फकीर  का मनेर मानुष गीतांजलि का प्राणेर मानुष है।

हम लालन फकीर और खास तौर पर गीतांजलि पर चर्चा जारी रखेंगे।फिलहाल रवींद्र संगीत पर आधिकारिक गीतवितान डाट काम से हम रवींद्र के उन गीतों की सूची दे रहे हैं,जिनमें बाउल प्रभाव है।गौरतलब है कि रवींद्र के सारे गीत गीतवितान शीर्षक से संकलित हैं।  

Tagore songs composed in Baul style

List of related Tagore songs

The following Tagore songs which are correspond to Baul style. These songs contain ideas with double meaning and the style of the tune pertaining to a homeless minstrel. They are fit for singing with modest or even without accompaniment. Rabindranath had combined this style with other formats of Hindustani classical music in order to suit his compositions.

Baul-Sur

  • Agune Holo Agunmoy

  • Akash Hote Khoslo Tara

  • Akashe Dui Hate Prem Bilay

  • Amader Bhoy Kahare

  • Amader Khepiye Beray

  • Amader Pakbe Na Chul

  • Amar Mon Bole Chai Chai

  • Amar Mon Jakhon Jagli Na Re

  • Amar Naiba Holo Pare

  • Amar Pothe Pothe Pathor

  • Amar Praner Manus Ache

  • Amar Sonar Bangla Ami

  • Amare Paray Paray

  • Ami Marer Sagor Pari

  • Amra Bosbo Tomar Sone

  • Amra Chas Kori Anande

  • Bachan Bachi Maren Mori

  • Bajre Tomar Baje Banshi

  • Bare Bare Peyechi

  • Bhenge Mor Ghorer Chabi

  • Bhule Jai Theke Theke

  • Bolo Bolo Bondhu Bolo

  • Byartho Praner Aborjona

  • Chi Chi Chokher

  • Choli Go Choli

  • Dao Hey Amar

  • Dukkha Jodi Na

  • E Din Aji Kon

  • Ebar Dukkho Amar

  • Ei Ekla Moder

  • Ei Shraboner Buker

  • Ei To Bhalo Legechilo

  • Gan Amar Jay Bhese

  • Ganer Bhelay Bela

  • Ghore Mukh Molin

  • Gram Chara Oi Rangamatir

  • Hay Hemantalaksmi

  • Hridoy Amar Oi Bujhi

  • Ja Chilo Kalo

  • Jakhon Porbe Na

  • Jakhon Tomay Aghat

  • Jani Jani Tomar

  • Jani Nai Go

  • Jatri Ami Ore

  • Je Ami Oi Bhese

  • Je Tomay Chare

  • Je Tore Pagol Bole

  • Jethay Tomar Lut

  • Jhnakra Chuler Meyer Kotha

  • Jodi Tor Bhabna

  • Jodi Tor Dak Shune

  • Khyapa Tui Achis

  • Kon Alote Praner Pradip

  • Kothin Loha Kothin

  • Ma Ki Tui Porer

  • Mati Toder Dak Diyeche

  • Matir Prodip Khani

  • Megher Kole Kole Jay

  • Moder Kichu Nai Re

  • Moner Modhye Nirobodhi

  • Na Re Na Re Hobe

  • Nirabe Thakis Sokhi

  • O Amar Mon Jakhan

  • O Bhai Kanai

  • O Dekha Diye Je Chole Gelo

  • O Jaler Rani

  • O Nithur Aro Ki Ban

  • Oder Kathay Dhnada Lage

  • Ogo Tomra Sabai Bhalo

  • Oi Asontaler Matir Pore

  • Or Maner E Bandh

  • Ore Agun Amar Bhai

  • Ore Jhor Neme Ay

  • Ore Tora Nei Ba Katha Bolli

  • Pagla Hawar Badoldine

  • Paye Pori Shono Bhai

  • Phagun Haway Haway

  • Phaguner Shuru Hotei

  • Phire Chal Matir Tane

  • Pothik Megher Dol Jote

  • Roilo Bole Rakhle Kare

  • Sabai Jare Sab Diteche

  • Se Ki Bhabe Gopon Robe

  • Sedine Apad Amar Jabe

  • Sharote Aj Kon Atithi

  • Sokhi Tora Dekhe Ja Ebar

  • Tar Anto Nai Go

  • Tomar Surer Dhara Jhare

  • Tor Apon Jone Charbe

  • Tor Shikol Amay Bikol

  • Tora Nei Ba Kotha Bolli

  • Tumi Bahir Theke Dile Bisam

  • Tumi Ebar Amay Laho

  • Tumi Je Surer Agun

  • Tumi Khushi Thako

Bahar-Baul

  • Basante Ki Shudhu

  • Ore Ay Re Tabe Mat

Behag-Baul

  • Akash Jure Shuninu Oi

  • Amay Dao Go Bole

  • Basanta Tor Shesh

  • Elem Natun Deshe

  • Jini Sakol Kajer

  • Mon Re Ore Mon

  • Or Bhab Dekhe Je Pay

  • Tora Je Ja Bolis Bhai

Behag-Khambaj-Baul

  • O Amar Chander Alo

  • Shiter Hawar Laglo Nachon

  • Dujone Dekha Holo

Bhairavi-Baul

  • Amay Bhulte Dite Naiko

  • Apnake Ei Jana Amar Phurabe

  • Ay Re Mora Phasal Kati

  • Biswajora Phad Petecho

  • Biswasathe Joge Jethay

  • Eto Alo Jaliyecho

  • Hey Nobina

  • Keno Re Ei Duwartuku

  • Lakshmi Jakhon Asbe

  • Oder Sathe Melao Jara

  • Pran Chay Chokshu Na Chay

  • Tomar Mohon Rupe Ke

  • Tui Phele Esechis

Bibhas-Baul

  • Aj Dhaner Khete Roudro

  • Aji Bangladesher Hridoy

  • Aji Pronomi Tomare

  • Aji Sharototapone Probhat

  • Ami Bhoy Korbo Na Bhoy

  • Ami Kan Pete Roi

  • E Bela Dak Poreche

  • Ei Je Tomar Prem

  • Ei Kothata Dhore

  • Ei To Tomar Prem Ogo

  • Ek Hate Or Kripan

  • Megher Kole Rod Heseche

  • Nayan Mele Dekhi Amay

  • Nishidin Bharasa Rakhis

  • Ogo Bhagyodebi Pitamohi

  • Ore Grihobasi Khol Dar

  • Pous Toder Dak Diyeche

  • Shrabon Tumi Batase Kar

Chhayanat-Baul

  • Amar Nayan Bhulano Ele

Desh-Baul

  • Amay Bandhbe Jodi Kajer

  • Aro Aro Probhu

  • Oi Je Jhorero Megher Kole

GourSarang-Baul

  • Badol Baul Bajay Re

Hameer-Baul

  • Basante Phul Gathlo

Iman-Baul

  • Akash Hote Akash Pothe

  • Ek Din Chine

  • Nityo Tomar Je Phul

  • Noy Noy E Modhur Khela

  • Sakal Snaje Dhay Je Ora

Iman-Kalingara-Baul

  • Poth Ekhono Sesh Holo Na

Jhijhit-Baul

  • Bajramanik Diye Gnatha

  • Sab Dibi Ke Sab Dibi Pay

Jogia-Baul

  • Ore Jete Habe Ar Deri

Kalingara-Baul

  • Amare Dak Dilo Ke

  • Ami Tarei Khuje Berai

  • Diner Pore Din

  • Kanna Hasir Dol

  • Sahaj Habi Sahaj Habi

Khambaj-Baul

  • Amar Kontho Hote

  • Amar Shesh Paranir Kori

  • Ami Phirbo Na Re

  • Bhalo Manush Noi Re

  • Chokh Je Oder

  • Ganer Jhornatolai

  • Kon Khela Je Khelbo

  • Moder Jemon Khela Temni

  • Nayan Chere Gele Chole

  • O To Ar Phirbe Na

  • Ore Pothik Ore Premik

  • Phul Tulite Bhul Korechi

  • Tomari Nam Bolbo Nana Chole

  • Tumi Hothath Haway

Mishra Behag-Baul

  • Jibon Jakhon Chilo

Mishra Jhijhit-Baul

  • Ore Shikol Tomay Kole

Pancham-Baul

  • Apon Hote Bahir Hoye

Pilu-Baul

  • Ami Jabo Na Go Omni

  • Ami Tarei Jani

  • E Poth Geche Konkhane

  • Nahoy Tomar Ja Hoyeche

  • O Amar Desher Mati

  • Rangiye Diye Jao Jao Jao

  • Sab Kaje Hat Lagai

  • Se Je Moner Manush Keno

Pilu-Bhimpalasi-Baul

  • Apni Amar Konkhane

Pilu-Khambaj-Baul

  • Kon Bhiruke Bhoy

Tilak-Kamod-Baul

  • Amar Kontho Tare Dake

http://www.geetabitan.com/raag/light-classical-and-regional-forms/baul.html


Thursday, September 7, 2017

रवींद्र दलित विमर्श-18 गौरी लंकेश असुर संस्कृति की अनार्य सभ्यता की द्रविड़ प्रवक्ता थीं,इसीलिए उनका वध हुआ। गांधी,दाभोलकर,पनेसर,कुलबर्गी,रोहित वेमुला के बाद गौरी लंकेश की हत्या फिर मनुस्मृति के स्थाई बंदोबस्त को लागू करने का नस्ली राष्ट्रवाद है,जिसका रवींद्रनाथ विरोध कर रहे थे। संत तुकाराम और चैतन्य महाप्रभु की हत्या कर दी और असहिष्णुता का वही आतंकवाद जारी है। भारत में बुद्ध�

रवींद्र दलित विमर्श-18

गौरी लंकेश असुर संस्कृति की अनार्य सभ्यता की द्रविड़ प्रवक्ता थीं,इसीलिए उनका वध हुआ।

गांधी,दाभोलकर,पनेसर,कुलबर्गी,रोहित वेमुला के बाद गौरी लंकेश की हत्या फिर मनुस्मृति के स्थाई बंदोबस्त को लागू करने का नस्ली राष्ट्रवाद है,जिसका रवींद्रनाथ विरोध कर रहे थे।

संत तुकाराम और चैतन्य महाप्रभु की हत्या कर दी और असहिष्णुता का वही आतंकवाद जारी है।

भारत में बुद्धमय भारत के अवसान के बाद हिंदुत्व पुनरूत्थान की प्रक्रिया महिषासुर वध की निरंतरता है और नस्ली राष्ट्रवाद का प्रतीक वही दुर्गावतार है,जिसकी ताजा शिकार गौरी लंकेश है।किसी मोमबत्ती जुलूस से इस व्यवस्था का अंत नहीं होने वाला है।

पलाश विश्वास

कल हमने रवींद्र के दलित विमर्श के तहत रवींद्र के दो निबंधों जूता व्यवस्था और आचरण अत्याचार की चर्चा की थी।आचरण अत्याचार में जाति व्यवस्था की अस्पृश्यता पर प्रहार करते हुए रवींद्र ने लिखा है कि गाय मारने पर प्रायश्चित्त का विधान है लेकिन मनुष्य को मारने पर सामाजिक प्रतिष्ठा मिलती है , उसी तरह अछूतों को छूने पर जाति चली जाती है लेकिन अछूतों पर अत्याचार,उत्पीड़न और उनकी बेदखली से जाति मजबूत हो जाती है।गोरक्षकों के तांडव में प्रायश्चित्त का विधान अब वध है।

जिस सामाजिक यथार्थ की बात रवींद्र ने उन्नीसवीं सदी में कही थी,वह आजादी के सत्तर साल बाद नरसंहार संस्कृति का नस्ली राष्ट्रवाद है।गोरक्षकों के तांडव पर हिंदू गांधी के पोते की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला बताता है कि कानून का राज और संविधान कितना बेमायने है और कानून व्यवस्था बहाल करने के लिए राष्ट्र की जिम्मेदारी और जबावदेही का क्या हाल है।

गोरक्षकों से नागरिकों को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ रहा है और इसमें भी नागरिकों की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है क्योंकि गोरक्षा तांडव अब नस्ली मनुस्मृति राष्ट्रवाद के हिंदुत्व का पर्याय है तो कारोपेरट फासिज्म के राजकाज की राजनीति और सत्ता इसी गोरक्षक सेना के समर्थन से हैं।

हमारी विकास यात्रा हमें लगातार मध्यकालीन बर्बर अंधकार युग की तरफ ले जा रही है,जिसका विकास दर से कोई संबंध नहीं है।विशुद्धता का यह रंगभेदी नस्ली वर्चस्व सभ्यता का संकट है।

ब्रिटिश हुकूमत का अंत हुआ और जैसा कि रवींद्र नाथ ने अपने मृत्युपूर्व लिखे निबंध में ब्रिटिश हुकूमत के स्थानांतरण के बाद भारत के भविष्य को लेकर चिंता जताते हुए चेतावनी जारी की थी,जैसे कि महात्मा ज्योति बा फूले और मतुआ चंडाल आंदोलन के नेता गुरुचांद ठाकुर समेत बहुजन पुरखों को आशंका थी,सत्ता ब्राह्मणवाद के नस्ली वर्चस्व को हस्तातंरित हो जाने के बाद हूबहू वही हो रहा है।

ब्रिटिश हुकूमत में पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली के तहत पेशा बदलने की छूट के तहत जाति व्यवस्था टूटने लगी थी और मनुस्मृति विधान के तहत ज्ञान,आस्था और उपासना,शस्त्र और संपत्ति के अधिकारों से वंचित बहुजनों को वे अधिकार मिलने लग गये थे,जो अब संवैधानिक रक्षाकवच के बावजूद छीने जा रहे हैं और भारतीय नस्ली वर्चस्व की मनुस्मृति संस्कृति फिर वही महिषासुर वध कथा है।

गांधी,दाभोलकर,पनेसर,कुलबर्गी,रोहित वेमुला के बाद गौरी लंकेश की हत्या फिर मनुस्मृति के स्थाई बंदोबस्त को लागू करने का नस्ली राष्ट्रवाद है,जिसका रवींद्रनाथ विरोध कर रहे थे।गौरी लंकेश असुर संस्कृति की अनार्य सभ्यता की द्रविड़ प्रवक्ता थीं, इसीलिए उनका वध हुआ।

यह मामला अभिव्यक्ति का संकट है या असहमति के विरुद्ध असहिष्णुता है,ऐसा राजनीतिक सरलीकरण सामाजिक यथार्थ के खिलाफ है। देशभर में ऐसे तमाम कांड लगातार होते जा रहे हैं और विरोध की रस्म अदायगी के बाद फिर अखंड मौन के मद्य़फिर फिर वध दृश्य की पुनरावृत्ति है।गांधी हत्या के बाद तो फिरभी एक लंबा अंतराल रहा है और दंगों और नरसंहारों में वैदिकी संस्कृति के वध उत्सव के मौन दर्शक बने नागरिक विद्वतजनों पर हो रहे ताजा हमलों में अपनी मौत की दस्तक सुनकर विचलित हो रहा है नागरिक समाज का पढ़ा लिखा तबका।

विरोध जताने की राजनीति के अलावा सामाजिक सक्रियता का अगला कदम उठाने की वह सोच ही नहीं सकता क्योंकि इसी तंत्र के बने रहने में उसके हित हैं।उसका वर्ग वर्ण हितों के विरुद्ध सत्ता परिवर्तन की राजनीति उसके लिए सुविधाजनक विकल्प है और सामाजिक बदलाव के लिए प्रतिरोध की संस्कृति उसके हितों के खिलाफ है।

गोरक्षकों के तांडव के मानस से भी ज्यादा खतरनाक यह सुविधा का विमर्श।

यही जूता व्यवस्था है ताकि जूता खाकर अपनी खाल बचायी जा सके।यही सवर्ण सत्ता वर्ग का मानस है।

रवींद्र के दलित विमर्श पर संवाद इसी सामाजिक यथार्थ की जांच पड़ताल है।रवींद्र भारत की समस्या को सामाजिक मानतेे रहे हैं और यह सामाजिक समस्या जितनी गुलामगिरि की कथा है,उतनी ही रवींद्र के सामाजिक यथार्थ जूता व्यवस्था यानी नस्ली सत्ता वर्चस्व के अंतर्गत जूता खाते रहकर अपनी हैसियत बचाने की संस्कृति है,जो अब बहुजन संस्कृति है तो यह वैदिकी विशुद्धता की संस्कृति भी है।

गुलामगिरि की जूता व्यवस्था में समाहित बहुजन समाज का यथार्थ यही है और यही बहुजनों का हिंदुत्वकरण है,जिसके दायरे से बाहर बने रहने के लिए इस देश में अनार्य द्रविड़ और दूसरी अनार्य नस्लों की जल जंगल जमीन की लड़ाई है,जिसके दमन के लिए नरसंहार संस्कृति का अंध नस्ली राष्ट्रवाद है।

बुद्धमय भारत के अवसान के बाद नस्ली सत्ता वर्चस्व के मनुस्मृति बंदोबस्त की यह संस्कृति भारत में इस्लामी शासन के करीब सात सौ सालों और ब्रिटिश हुकूमत के दो सौ सालों के दरम्यान बनाये रखने के लिए सत्ता वर्ग ने उनकी गुलामी का महिमामंडन करते हुए उनकी सत्ता में भागेदारी के जरिये बहुजनों और खासतौर पर आदिवासियों का उत्पीड़न और दमन का सिलसिला जारी रखा है और इसीलिए हिंदुत्व एजंडे के तहत हिंदू राष्ट्र के वास्तुकार हिंदू महासभा और संघ परिवार ने भारतीय जनता के एकताबद्ध स्वतंत्रता संग्राम के खिलाफ ब्रिटिश हुकूमत का साथ दिया तो आज वे श्वेत आतंकवाद के अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजराइली जायनी आतंकवाद के साथ खड़े हैं।

मनुस्मृति व्यवस्था के सत्ता वर्ण और वर्ग ने इसी तरह शक हुण पठान मुगल विदेशी हुकूमत का कभी विरोध नहीं किया और उनके खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम भी बहुजन और आदिवासी समुदायों के लोग, किसान और मेहनतकश तबके लड़ते रहे हैं।

भारत में बुद्धमयभारत के अवसान के बाद हिंदुत्व पुनरूत्थान की प्रक्रिया महिषासुर वध की निरंतरता है और नस्ली राष्ट्रवाद का प्रतीक वही दुर्गावतार है,जिसकी ताजा शिकार गौरी लंकेश है।किसी मोमबत्ती जुलूस से इस व्यवस्था का अंत नहीं होने वाला है।

भारत की मौजूदा समस्याएं राजनीतिक नहीं हैं ,आज भी असमानता,अन्याय और उत्पीड़न,बेदखली और नरसंहार की ये तमाम समस्याएं सामाजिक समस्याएं हैं और उनका राजनीतिकरण करने से वे समस्याएं सुलझने वाली नहीं हैं। सामाजिक बदलाव के बिना सामाजिक यथार्थ बदलेगा नहीं।इसिए सामाजिक यथार्थ को समझना बेहद जरुरी है।

कल हमारे गुरुजी ताराचंद्र त्रिपाठी का फोन आया था और हमारी उनपर रवींद्र के दलित विमर्श पर लंबी बातचीत हुई।वे रवींद्र के भारतवर्षेर इतिहास की तर्ज हमें इतिहास पढ़ाते रहे हैं और हम इस पर हस्तक्षेप पर चर्चा पहले ही कर चुके हैं।रवींद्र की तरह ही वे मानते हैं कि इतिहास शासक वर्ग का नहीं होता,इतिहास जनता बनाती है और इतिहास जनता का इतिहास होता है।रवींद्र के दलित विमर्श में भारत की समूची दर्शन परंपरा की जनपदीय लोकसंस्कृति की साझा विरासत को सत्ता वर्ग के नस्ली राष्ट्रवाद का एकमात्र प्रतिरोध वे भी मानते हैं।उन्होंने इस संवाद को पुस्तक में समेटने का सुझाव भी दिया है।हमने उनसे यही निवेदन किया कि हम आलोचकों,संपादकों और प्रकाशकों की दुनिया के बाहर के जीव हैं और इसलिए हम पुस्तकें छापने के चक्कर में नहीं पड़ते जो अंततः पढ़े लिखे सवर्म विद्वतजनों तक सीमाबद्ध हो जाती हैं और आम जनता और बहुजनों के साथ संवाद की कोई स्थिति नहीं बनती। इसीलिए हम वैकल्पिक मीडिया की बात करते रहे हैं और इसी सिलसिले में सोशल मीडिया में मोबाइल क्रांति के जरिये जुड़े भारी संख्या में मौजूद बहुजनों और आदिवासियों को सीधे संबोधित करने का प्रयास करते हैं।

इस संवाद की मुख्य समस्या सोशल मीडिया में स्पेस की कमी है।जिस वजह से कल रवींद्र विमर्श-सत्रह को दो भागो में बांटकर हस्तक्षेप में लगाना पड़ा।हमने कल सारा दिन बाउल साहित्य,बाउल गान,बाउल आंदोलन और बाउल रवीद्र के साथ लालन फकीर से संबंधित सामग्री सोशल मीडिया पर शेयर किया है।

हमने रवींद्र रचना धर्मिता में बुद्धमय भारत की चर्चा की है और वैदिकी संस्कृति के असर की मुख्यधारा में रवींद्र विमर्श के बारे में चर्चा फिलहाल नहीं कर रहे हैं।बाकी लोग ऐसा ही करते रहे हैं।रवींद्र संगीत के प्रेम पर्व और पूजा पर्व विभाजन से इसमें समाहित संत परंपरा और लोक संस्कृति की साझा विरासत का अता पता गायब है।भारत के भक्ति आंदोलन के नामकरण में भी वही विभ्रम है क्योकि दैवी सत्ता के विरोध में भक्ति की प्रासंगिकता नहीं है। इसीतरह रवींद्र संगीत में प्रेम मनुष्यता का धर्म है तो पूजा दैवी सत्ता का विरोध।रवींद्र संगीत और गीतांजली के गीत की भावभूमि सीधे तौर पर बाउल परंपरा से जुड़ती है और रवींद्र को इसलिए बंगाल का सबसे महान बाउल कहा जाता है।

गीताजंलि की रचनाओं के बारे में कहा जाता है कि बाउल लालन फकीर के लोकसंस्कृति में रचे बसे लोक बोली में  अभिव्यक्त दर्शन को रवींद्र ने गीतांजलि में परोसा है।रवींद्र ने बार बार लालन फकीर के बारे में लिखा भी है।

गीतांजलि और रवींद्र संगीत को समझने के लिए बाउल आंदोलन,बाउल पंरपरा और बाुल दर्शन पर विस्तार से चर्चा की जरुरत है।जो एकसाथ संभव नहीं है।जाहिर है कि यह चर्चा लंबी चलने वाली है।

बांग्लादेश में बाउल आंदोलन और संस्कृति पर व्यापक पैमाने पर काम हुआ है और सारी सामग्री बांग्ला में है.वहां जनपदों की लोकसंस्कृति पर लगातार विमर्श और संवाद जारी रहता है और बांग्लादेशी साहित्य भी जनपदों की बोलियों में लिखा जाता है।

हमारे यहां बोलियों की कोई संस्कृति नहीं बची है और मुक्त बाजार ने भारतीय कृषि,किसानों और मेहनतकश तबके, कारोबारियों के साथ साथ जनपदों का और जनपदों की लोक संस्कृति की साझा विरासत का सत्यानाश कर दिया है और इसी के नतीजतन सत्ता वर्चस्व की मुक्तबाजारी कारोपोरेट वध संस्कृति के नस्ली राष्ट्रवाद की यह नस्ली सुनामी है और जनपदों के लोकतंत्र की कृषि व्यवस्था के पांरपारिक उत्पादन संबंधों की साझा विरासत की बहाली के बिना हम मनुस्मृति राष्ट्रवाद के महिषासुर वध की निरंतरता को रोक नहीं सकते।यह बेहद कठिन कार्यभार है।

गौरतलब है कि हम रवींद्र विमर्श से संबंधित संदर्भसामग्री लगातार सोशल मीडिया पर शेयर कर रहे हैं।मेरे फेसबुक पेज Palash Biswas Updates पर सारी संदर्भ सामग्री और हस्तक्षेप के तमाम लिंक हैं,आप उन्हें अलग से देखते पढ़ते रहे तो हम सोशल मीडिया पर इस विमर्श की सीमाओं को तोड़ सकते हैं।

आज हम बाउल आंदोलन के बारे में थोडी च्रचा करना चाहते हैं।बाउल परंपरा में दैवी सत्ता का निषेध है।मनुष्य की देह ही उनकी आस्था का आधार है।रवींद्र पर बाउल देहतत्व का असर नहीं हुआ,लेकिन पुरोहित तंत्र और ब्राह्मण धर्म के खिलाफ धर्मनिरपेक्ष मनुष्यता के धर्म की बाउल परंपरा के शायद वे सबसे बड़े प्रवक्ता

थे।रवींद्र के जिन गीतों के लिए नोबेल पुरस्कार मिला, वे सारे गीत बााउल मनुष्यता के धर्म के मुताबिक पुरोहित तंत्र और ब्राह्मण धर्म दोनों के खिलाफ हैं।

रवींद्र के बाद हाल में दूसरी बार गीतों के लिए जिन्हें नोबेल पुरस्कार मिला, वे बाब डिलान भी रवींद्र की तरह अपने को बाुल कहते रहे हैं।बाुल परंपरा से जुड़ने के लिए वे बंगाल के बाउलों के साथ बंगाल में रह चुके हैं।

बाउल जाति धर्म से ऊपर हैं।जाति उनकी कुछ भी हो सकती है और धर्म भी उनका कुछ भी हो सकता है।बाउल शब्द की उत्पत्ति चैतन्यलीलामृत में परम वैष्णवों के लिए इस्तेमाल किये गये महाबाउल शब्द में बतायी जाती है।

बाउल दर्शन पर वैष्णव और सूफी दोनों आंदोलनों का असर है और उनकी सहजिया जीवनपद्धति में धार्मिक कर्मकांड,संस्कारों का निषेध है।यह ब्राह्मण धर्म के खिलाफ एक और जनविद्रोह है।

वैष्णव आंदोलन हिंदुत्व में समाहित हो गया लेकिन बाउल परंपरा का जाति धर्म अस्मिताओं से कुछ भी लेना देना नहीं है।उनके लिए मनुष्य की अंतरात्मा ही सार्वभौम है और वही अंतिम सत्ता है और इस अंतरात्मा के अलावा कोई दैवी सत्ता नहीं है।रवींद्र रचनासमग्र में भी दैवी सत्ता के स्थान पर यही अंतरात्मा का स्थान है।चूंकि आत्मा का आधार मनुष्यदेह  है इसलिए बाउलों के लिए देह पवित्रतम है।बाउल गान आत्मचेतना का गीत है।यह अंतरात्मा का आवाहन है।रवींद्र संगीत का पूजा पर्व भी अंतरात्मा का आवाहन है।

सूफी मत का जैसे बौद्ध सहजिया पंथ में समायोजन हुआ तो बाउल आंदोलन बंगाल में बौद्ध,सूफी और वैष्णव धाराओं की मनुष्यता का धर्म और प्रेम और अहिंसा का दर्शन है।इसी बिंदू पर गांधी और रवींद्र के जीवन दर्शन एकाकार हैं,जहां मनुष्यता का उत्कर्ष ही सभ्यता का प्रतिमान है।

लालन फकीर मुसलमान थे लेकिन संत कबीर की तरह उनके जन्म और धर्म को लेकर किंवदंतियां प्रचलित है।

माना जाता है कि वे जन्मजात हिंदू थे और तीर्थयात्रा के दौरान चेचक निकलने पर मरणासण्ण हो जाने की वजह से उनके साथी उन्हें छोड़कर गांव वापस आकर उनके मरने की खबर फैला दी। बीमार हालत में एक मुसलमान परिवार ने उनकी सेवा की और वे बच गये लेकिन उनका धर्म चला गया और वे मुसलमान हो गये।परिवार ने भी उन्हें विधर्मी मानकर त्याग दिया।

बाउल बनने के बाद उन्हीं लालन फकीर के अनुयायीू संत कबीर दास की तरह हिंदू और मुसलमान दोनों संप्रदायों के हैं।

रवींद्र पर वैदिकी साहित्य,बौद्ध साहित्य,बाउल गान के अलावा भारत के संत आंदोलन का गहरा असर रहा है।गुरु नानक,सूरदास और कबीर दास का उनपर गहरा असर रहा है,इस पर हम अलग से चर्चा करेंगे।

बंगाल के बाउलों का बंकिम के आनंदमठ के तथाकथित सन्यासी विद्रोह यानी आदिवासी किसान विद्रोह में साधुओं और फकीरों के साथ बड़ी भूमिका रही है तो बांग्लादेश की लड़ाई में भी वे शामिल रहे हैं।

संस्कृत काव्यधारा के अंतिम महाकवि जयदेव आदिबाउल माने जाते हैं।कवि जयदेव बंगाल में सेनवंश के अंतिम शासक राजा लक्ष्मणसेन के सभाकवि थे।उनके लिखे गीतगोविन्द में श्रीकृष्ण की गोपिकाओं के साथ रासलीला, राधाविषाद वर्णन, कृष्ण के लिए व्याकुलता, उपालम्भ वचन, कृष्ण की राधा के लिए उत्कंठा, राधा की सखी द्वारा राधा के विरह संताप का वर्णन है।

संस्कृत काव्य धारा के विपरीत उन्होंने कृष्ण और राधा को हाड़ मांस के मनुष्य के रुप में चित्रित किया और छंद और अलंकार में संस्कृत का व्याकरण और सौंदर्यशास्त्र को तोड़ते हुए देशज छंद और अलंकार का प्रयोग किया। डॉ॰ ए॰ बी॰ कीथ ने अपने 'संस्कृत साहित्य के इतिहास' में इसे 'अप्रतिम काव्य' माना है। सन् 1784 में विलियम जोन्स द्वारा लिखित (1799 में प्रकाशित) 'ऑन द म्यूजिकल मोड्स ऑफ द हिन्दूज' (एसियाटिक रिसर्चेज, खंड-3) पुस्तक में गीतगोविन्द को 'पास्टोरल ड्रामा' अर्थात् 'गोपनाट्य' के रूप में माना गया है। उसके बाद सन् 1837 में फ्रेंच विद्वान् एडविन आरनोल्ड तार्सन ने इसे 'लिरिकल ड्रामा' या 'गीतिनाट्य' कहा है। वान श्रोडर ने 'यात्रा प्रबन्ध' तथा पिशाल लेवी ने 'मेलो ड्रामा', इन्साइक्लोपिडिया ब्रिटानिका (खण्ड-5) में गीतगोविन्द को 'धर्मनाटक' कहा गया है। इसी तरह अनेक विद्वानों ने अपने-अपने ढंग से इसके सम्बन्ध में विचार व्यक्त किया है। जर्मन कवि गेटे महोदय ने अभिज्ञानशाकुन्तलम् और मेघदूतम् के समान ही गीतगोविन्द की भूरि-भूरि प्रशंसा की है।


कवि जयदेव के राधा कृष्ण प्रेम में बंगाल के दो बड़े आंदोलनों की उत्पत्ति हुई और ये दोनों आंदोलन ब्राह्मण धर्म और पुरोहित तंत्र के खिलाफ हैं।बाउल आंदोलन और वैष्णव आंदोलन की मूल प्रेरणा कवि जयदेव और उनका गीत गोविंदम है जहां प्रेम ही मनुष्यता का दर्शन है।

कवि जयदेव की स्मृति में ही बीरभूम के केंदुुली में सदियों से दुनियाभर के बाउल जयदेव मेले में जुटते हैं।केंदुलि शांतिनिकेतन से 42 किमी दूर है।

বাউল মতবাদকে একটি মানস পুরাণ বলা হয়। দেহের আধারে যে চেতনা বিরাজ করছে, সে-ই আত্মা । এই আত্মার খোঁজ বা সন্ধানই হচ্ছে বাউল মতবাদের প্রধান লক্ষ । ধর্মীয় দৃষ্টিকোণ থেকে দেখলে একে পৃথক দর্শন বুঝায়। কিন্তু আসলে এ কোন পৃথক মতবাদ নয়।

শান্তিনিকেতনের বাটিক প্রিন্টিং-এ বাউলের চিত্র।

এটি ধর্মীয় দর্শন থেকে সৃষ্ট আত্ম চিন্তার রুপভেদ। যা মুলতঃ আত্মার অধ্যাত্ম চেতনার বহিপ্রকাশ। বাংলাদেশের লোক সাহিত্য ও লোকঐতিহ্য, লালন শাহ বিবেচনা-পূর্নবিবেচনা প্রভৃতি গ্রন্থে গবেষকগণ লিখেছেন; আরবের রাজ শক্তির প্রতিঘাতে জন্ম হয়েছে সুফি মতবাদের । এটিকে লালন-পালন করেছে পারস্য। বিকাশ ইরান ও মধ্য এশিয়ায়। পরবর্তিতে যতই পূর্ব দিকে অগ্রসর হতে থাকে এর মধ্যে ততই পূর্বদেশীয় ভাবধারার সম্মিলন ঘটতে থাকে। দহ্মিণ এশিয়ায় এসে অধ্যাত্ম সঙ্গীত চর্যাগীতিতে রুপান্তর হয়। অতপর তুর্কী বিজয়ের মধ্যদিয়ে মধ্যপ্রাচ্যের সূফী-দরবেশ গণের আগমনে বৌদ্ধ সিদ্ধাচর্যাগণের আদর্শ মানবতাবাদ, সুফীবাদে সম্মিলিত হয়ে ভাবসঙ্গীতে রুপান্তর হয় । ফলে সুফী দর্শন অতি সহজে বৌদ্ধের কাছের প্রশংসনীয় হয় । কাজেই একদিকে সূফীবাদ এবং অন্যদিকে বৌদ্ধ সাধনা এই সকলের সমম্বয়ে গড়ে উঠে মরমী ভাব-সাধনা [১][২][৩]। গবেষক সৈয়দ মোস্তফা কামাল, ডঃ আশরাফ সিদ্দিকী সহ অনেকে এ অভিমত পোষন করেন; মধ্যযুগের প্রারম্ভে বাংলার শ্যামল জমিনে অদৈত্ববাদের মধ্যদিয়ে ভারতে চৈতন্যবাদ বিকশিত হয় পঞ্চদশ শতাব্দিতে। তখন ভাগবতধর্ম, আদি রামধর্ম ও কৃষ্ণধর্মের মিলনে বৈঞ্চবধর্ম আত্মপ্রকাশ করে। এতে করে বৈঞ্চবী সাধন পদ্ধতির মধ্যে অনিবার্য রূপে শামিল হয় প্রাচীন মরমীবাদ । ফলে পূর্বরাগ, অনুরাগ, বংশী, বিরহ, দেহকাঁচা ও সোয়া-ময়না সম্মেলিত ইত্যাদি মরমী সাহিত্যের শব্দ, নামে উপনামে বৈঞ্চববাদে বা বৈঞ্চব সাহিত্যে সরাসরি ধার করা হয় । এ ভাবে মরমীবাদের হূদয়স্পর্সী শব্দমালায় রচিত সঙ্গীত বাউল সঙ্গীত নামে আত্মপ্রকাশ করে এক নতুন সম্প্রদায়ের জন্ম দেয়, যা আজকাল বাউল নামে অভিহিত [১]। 'বাহুল' বা 'ব্যাকুল' থেকে 'বাউল' নিষ্পন্ন হতে পারে বলে অনেকেই মনে করেন। আবার আরবি 'আউল' বা হিন্দি 'বাউর' থেকেও শব্দটি আসতে পারে। যেভাবে যে অর্থই আভিধানিক হোক না কেন, মূলত এর ভাব অর্থ হলো, স্রষ্টা প্রেমিক, স্বাধীন চিত্ত, জাতি সম্প্রদায়ের চিহ্নহীন এক দল সত্য সাধক, ভবঘুরে[২]। বাউলদের মনের ভাব প্রকাশের মাধ্যম হচ্ছে বাউল সঙ্গীত নামে পরিচিত আধ্যাত্মচেতনার গান । এ বিষয়ে দেওয়ান মোহাম্মদ আজরফ বলেছেন : ইদানিং বাউল শব্দের উৎপত্তি নিয়ে নানা বাক-বিতন্ডার সৃষ্টি হয়েছে। কেউ বা একে সংস্কৃত 'বতুল' (উন্মাদ, পাগল, ক্ষেপা, ছন্নছাড়া, উদাসী) শব্দের অপভ্রংশ বলে মনে করেন । তবে যা থেকেই বাউল শব্দের উৎপত্তি হোক না কেন, বর্তমানে বাউল মতবাদ একটি বিশেষ মতবাদে পরিণত হয়েছে। [১]

বাউল মতবাদ

https://bn.wikipedia.org/s/21xy


The Kenduli Mela provides a unique opportunity to catch a glimpse of the wandering minstrels called Bauls, who believe in the simplicity of love of life and who propagate universal love that transcends religion. Thousands of people from all over the country and overseas flock to this three-day musical event which celebrates soulful music and is an opportunity to meet the Bauls in their saffron attire carrying a musical instrument called the Ektara.

प्रेम के इसी दर्शन पर आधारित है चैत्नय महाप्रभू का वैष्णव आंदोलन जिसके तहत हरिमाम के जाप के तहत अछूतों को व्यापक पैमाने पर हिंदू मान लिया गया।बंगाल में अस्पृश्यता बाकी बारत की तुलना में उतना कठोर न होने का बड़ा कारण अनार्य द्रविड़ सभ्यता के साथ साथ बौद्धमय विरासत है तो दूसरा बड़ा कारण चैतन्य महाप्रभू का वैष्णव आंदोलन है,जो वैदिकी कर्म कांड के विपरीत पुरोहित तंत्र के विपरीत विशुद्ध मनुष्यता के धर्म पर आधारित प्रेम का दर्शन है और यही प्रेम का दर्शन बाउल पंरपरा है।

गौरतलब है कि लालन फकीर पर भी हमले होते रहे और बाउलों के साथ साथ वैष्णवों के अखाड़ों पर भी कट्टरपंथियों के हमले होते रहे।बाउल धर्मनिरपेक्षता हमेशा निशाने पर रही है तो पुरी यात्रा के दौरान चैतन्य महाप्रभु की रहस्यमय मृत्यु हो गयी और उनकी देह का पता ही नहीं चला जैसे संत तुकाराम सशरीर वैकुंठ चले गये,उसी तरह कहा गया कि चैतन्य महाप्रभु भी भगवान जगन्नाथ के शरीर में समाहित हो गये।

दरअसल पुरोहित तंत्र ने ही संत तुकाराम और चैतन्य महाप्रभु की हत्या कर दी और असहिष्णुता का वही आतंकवाद जारी है।

The word Baul comes from the Sanskrit "Batul," which means mad, or "afflicted by the wind disease." The Bauls are India's wandering minstrels of West Bengal, whose song and dance reflect the joy, love and longing for mystical union with the Divine. Bauls are free thinkers who openly declare themselves to be mad for the God who dwells within us all.

The Bauls of Bengal have made no effort to record their practices, lives or beliefs, for they are reluctant to leave a trace behind. Therefore little concrete documentation is available when exploring the group's origin. Scholars have instead turned to the songs of the Bauls to piece together their potential history. Examining the style and language of the Bauls' music, links the sect to distinct groups that share their unique style of worship.

The first traces of practices similar to those of the Bauls appear in the caryāpadas, the oldest texts recorded in Bengali tongue. These ancient documents – dating back nearly one thousand years – contain poems once sung by a religious sect of Bengal known as the Siddhācāryas. The caryāpadas reference the appropriate behaviors and restraints for an individual wishing to be find the "ultimate release." The Bauls share this early sect's philosophy of achieving personal freedom through practical means and worship, also known as Tantra. The poems of the Siddhācāryas also have a similar metaphoric nature to those of the Bauls vague and often enigmatic songs.

The Siddhācāryas are thought to have been diverse in background, as the caryāpadas contain ideas and phrases of both Buddhist and Saivite Hindu origins. Their religious diversity and shared goal of personal liberation strongly link this Bengali group to the Bauls that had yet to exist as we know them today.

However as India has progressed drastically over the course of history, the religious make-up of Bengal has shifted as well. Islam and Vaisnavism dominate where Buddhism and Saivite Hinduism once did. The dramatic shift in religious climate opened the door for individuals to combine the influence of the various forms of spirituality. A few of the Bauls recorded songs mention Nerā, a caste derived from the former Buddhist monks and nuns who, with the slow decline of Buddhism, abandoned celibacy for a tantric style of worship similar to the Bauls. The references to this caste in Baul music again supplies scholars a thread with which to connect this mysterious group to the past.

Before, the Bauls roamed Bengal on foot; nomads spreading their music and dance. In each village there was a special house set aside for them to stay in, and they would stay as long as they pleased. When they would arrive, the villagers would supply them with food and the necessities of life for as long as their visit lasted. Subhendu "Bapi" Das says:

"That was the responsibility of the village people. And the bauls' responsibility is to make them happy, give them happy, give them a clear message of life, so they can go on with their happy soul."

He has also said that unfortunately modern India can no longer support their nomadic way of living, so therefore they have had to adapt. "Now it is totally different. Before, people have respect for many things, and now those things are gone because the time is changing. Now bauls have their own house and they stay in one place, not moving around. Baba (Purna Das Baul) has a house in Calcutta, and he is very famous for this type of music and this tradition and philosophy. People respect him and they are making lots of concerts to him, and that's how the life is going on," says Bapi Das.

https://bauls.wordpress.com/history/